डॉ. उर्मिलेश: शब्दों में जीवित, स्मृतियों में आलोकित
Jul 7, 2026कुछ व्यक्तित्व जीवन में केवल मिलते नहीं, वे भीतर कहीं स्थायी रूप से बस जाते हैं। डॉ. उर्मिलेश शंखधार जी मेरे लिए ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। साहित्य के विराट आकाश में वे ओज, गीत, ग़ज़ल और वाचिक परंपरा के तेजस्वी नक्षत्र थे, पर मेरे मन में उनकी स्मृति केवल एक बड़े कवि के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मीय प्रेरक, स्नेहिल मार्गदर्शक और गरिमामयी उपस्थिति के रूप में अंकित है।
प्रेषक: Abhinav Shukla @ 7/07/2026 0 प्रतिक्रियाएं
गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १
Jun 29, 2026गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशम् ।(सत्यम् + ज्ञानम् + अनन्तम् + नित्यम् + अनाकाशम् + परम + आकाशम्)गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम् ॥(गोष्ठ + प्राङ्गण + रिङ्खण + लोलम् + अनायासम् + परम + आयासम्)मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारम् ।(माया + कल्पित + नाना + आकारम् + अनाकारम् + भुवन + आकारम्)क्ष्मायानाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥(क्ष्मायाः + नाथम् + अनाथम् + प्रणमत + गोविन्दम् + परम + आनन्दम्)-------------------------------------------------------------------------सत्यम् – Absolute Truth; Ultimate Realityज्ञानम् – Pure Consciousnessअनन्तम् – Infinite; Endlessनित्यम् – Eternalअनाकाशम् – Beyond space; Not limited by spaceपरम – Supremeआकाशम् – Space; Etherपरमाकाशम् – The Supreme, Infinite Consciousnessगोष्ठ – Cowherd settlementप्राङ्गण – Courtyardरिङ्खण – Crawlingलोलम् – Delighting inगोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलम् – Delighting in crawling through the courtyards of Gokulaअनायासम् – Effortlesslyपरमायासम् – Great effortमाया – Divine powerकल्पित – Projectedनाना – Manyआकारम् – Formsमायाकल्पितनानाकारम् – Appearing in countless forms through Māyāअनाकारम् – Formlessभुवनाकारम् – Whose form is the entire universeक्ष्मायाः – Of the Earthनाथम् – Lord; Protectorक्ष्मायानाथम् – Lord of the Earthअनाथम् – Independent; Protector of the helplessप्रणमत – Bow downगोविन्दम् – Govindaपरमानन्दम् – Supreme Bliss
प्रेषक: Abhinav Shukla @ 6/29/2026 0 प्रतिक्रियाएं
बवंडर
Sep 25, 2025
प्रेषक: अभिनव @ 9/25/2025 0 प्रतिक्रियाएं
एक गीत - हाल कैसा है हमारा
Sep 24, 2025रेत मुट्ठी से फिसलती जा रही है,
लौटने को है लहर छूकर किनारा।।
आसमाँ के चाँद तारे पूछते हैं,
क्या बताएं हाल कैसा है हमारा।।
कहने को हम साथ हैं, लेकिन कहाँ हैं,
बढ़ रही हर बात पर अब दूरियाँ हैं।
दुनिया वालों को दिखाकर हँस रहे हैं,
मन के भीतर ये प्रदर्शन धँस रहे हैं।
दो किनारों पर महोत्सव सज रहे हैं,
मौन है गहराई में नदिया की धारा।।
मन की पूछो बात तो हम अनमने हैं,
स्वप्न सब बिखरे अधूरे अधबने हैं।
दर्द ने ही दोस्ती कर ली दवा से,
छत पे जलता दीप कहता है हवा से।
हो सके तो तुम ही मेरा साथ दे दो,
डोर नाज़ुक है नहीं दिखता सहारा।।
मुस्कुराना लग रहा अपवाद तुमको,
दोष मेरे हैं हज़ारों याद तुमको।
क्या कभी उल्लास के क्षण भी यहाँ थे,
थे यदि तो किस जगह, आखिर कहाँ थे।
जाने क्यों धुंधला सा होता जा रहा है,
झिलमिलाता दिख रहा था जो सितारा।।
तन को उलझाया है झूठे अनुकरण में,
और मन अटका तुला के संतुलन में।
क्या प्रयोजन है भला इस प्रज्ज्वलन का,
क्या यही उद्देश्य था अपने मिलन का।
दम्भ की दीवार ऊँची उठ रही है,
प्रेम की गंगा है या सागर है खारा।।
प्रेषक: अभिनव @ 9/24/2025 0 प्रतिक्रियाएं
रामधारी सिंह "दिनकर"
Sep 23, 2025
प्रेषक: अभिनव @ 9/23/2025 0 प्रतिक्रियाएं
नवरात्रों की शुभकामनाएं!
Sep 22, 2025प्रेषक: अभिनव @ 9/22/2025 0 प्रतिक्रियाएं
नीचे बादल, ऊपर हम हैं
Sep 12, 2025
प्रेषक: अभिनव @ 9/12/2025 0 प्रतिक्रियाएं
भारत की धड़कन
Sep 9, 2025भारत की धड़कन
जहाँ मातु यशोदा की गोदी में झूल कन्हैया सोता है,
जहाँ रामचरितमानस के स्वर गलियों में गूंजा करते हैं,
तुलसी-कबीर-रसखान-सूर घर घर में पूजा करते हैं|
जहाँ चैती, कजरी, बिरहा, आल्हा, सावन गाया जाता है,
अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, ब्रज रंग सजाया जाता है,
जहाँ एक तरफ हैं गीता प्रेस अक्षर पढ़ना सिखलाते हैं,
दूजे हैं बांके पहलवान कुश्ती लड़कर दिखलाते हैं|
साड़ी, चूड़ी, खुशरंग इत्र संग सुरमा और कटारी हैं,
पीतल, नक्काशी, जरदोज़ी, ताले, कालीन हमारी हैं,
जहाँ ताजमहल की श्वेत धरोहर प्रेम रंग बिखराती है,
नित पान की लाली होठों पर मुस्कान सुरीली लाती है|
बम भोले, हर हर महादेव की काशी जहाँ सुशोभित है,
वह धरती जिसकी जगमग से जगपालक तलक अचंभित है,
मेरठ है, मंगल पांडे हैं, झाँसी है, लक्ष्मी रानी हैं,
आज़ाद, पथिक, बिस्मिल, टंडन, अशफाकुल्ला, मोहानी हैं|
बिस्मिल्ला की शहनाई जहाँ सुबह को पुकारा करती है,
हर शाम ए अवध तहज़ीबों की ज़ुल्फ़ों को संवारा करती है,
तुमको लगता है, बस धोती, गमछा और अचकन रहती है,
मुझको लगता है यू पी में भारत की धड़कन रहती है।
प्रेषक: अभिनव @ 9/09/2025 0 प्रतिक्रियाएं
सिन्दूरी सी सुबह
May 20, 2025
हनुमान जी की पूँछ जो जलाई रावण ने,
लंका नगरी हेतु महाविपात हो गई।
आधी रात में ही सिन्दूरी सी सुबह हुई,
सुबह जो हुई दुष्टों की रात हो गई।
तुर्क, चीन, पाक — सब पुतले दहन हुए,
धूल धसरित सारी चौधरात हो गई।
"जय हिंद" की ध्वनि से गूंजने लगा गगन,
भारती की आरती की शुरुआत हो गई।
जय हिन्द की सेना! जय हिन्द!
प्रेषक: अभिनव @ 5/20/2025 0 प्रतिक्रियाएं
महाराजा अग्रसेन आपको प्रणाम है।
May 14, 2025सूर्यवंश का धवल तेज बिखराने वाले,
महाराज वल्लभ के प्रताप को प्रणाम है।
वीरभूमि अग्रोहा जी को है नमन नित,
महालक्ष्मी के दिव्य जाप को प्रणाम है।
‘एक टका, एक ईंट’ धन्य धन्य रही रीत,
व्यक्ति से समाज के मिलाप को प्रणाम है|
शांति, तप, त्याग, तेज, ज्ञान के परम धाम,
महाराजा अग्रसेन आपको प्रणाम है।
प्रेषक: अभिनव @ 5/14/2025 0 प्रतिक्रियाएं
आपरेशन सिन्दूर - चार दिन चार छंद
May 11, 2025मज़हब पूछ कर आग बरसाने वालों,
शौर्य देख के घमंड चूर चूर हो गया|
चीन-अमरीका-तुर्क कोई न किसी का सगा,
आशा है हर एक भ्रम दूर दूर हो गया|
सोफिया की व्योमिका की, बात सुनें बिटिया की,
पाप का घड़ा हुज़ूर, भरपूर हो गया|
प्रीत वाली रीत संग, भरा था जो लाल रंग,
बन के सिन्दूर वही मशहूर हो गया|
महाराज विक्रम का नाम बतलाता हमें,
न्याय का सदैव अधिपत्य होना चाहिए|
कपटी कुटिल छली असुरों का विष दल,
इनका दलन अब नित्य होना चाहिए|
खैबर, बलूच, सिंधु की करुण है पुकार,
खंड खंड कर कृत कृत्य होना चाहिए|
सज्जनों को यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण करने को,
दुर्जनों का राम नाम सत्य होना चाहिए।
नई तकनीक वाला नए युग का है युद्ध,
नई चाल चल नए रंग भी दिखायेगा|
पश्चिम जो दे रहा है दुष्ट पाक को उधार,
हथियारों का भी इंतज़ाम करवाएगा|
गूगल का सीईओ न माईक्रो सॉफ्ट वाला,
अजयपाल ट्रम्प न पटेल काम आएगा|
खेत की कटाई हेतु स्वयं भिड़ना पड़ेगा,
बाहर से आके कोई हाथ न बंटाएगा|
घर के पड़ोस में हो ज़हरीला नाग यदि,
फन भी उठाएगा, डसेगा, इतराएगा।
आप भले सत्तरह बार दें खदेड़ उसे,
दुष्ट है, वो बार-बार लौट कर आएगा।
उसको तो जीतना है सिर्फ एक बार,
साम दाम दंड भेद सब आज़मायेगा|
धर्म युद्ध है यह, इसे नीति न तोलियेगा,
शास्त्र को भी अंततः शस्त्र ही बचाएगा।
- अभिनव शुक्ल
प्रेषक: अभिनव @ 5/11/2025 0 प्रतिक्रियाएं
एक आत्मसमर्पण गीत
Apr 24, 2025
प्रेषक: अभिनव @ 4/24/2025 0 प्रतिक्रियाएं
नेहरू जी के निधन पर अटल जी के श्रद्धासुमन।
Aug 18, 2018प्रेषक: अभिनव @ 8/18/2018 0 प्रतिक्रियाएं
भीड़तंत्र
Aug 14, 2018नफरतें स्वतंत्र हैं,
छद्म वेष में स्वतंत्र,
दुष्टता के मंत्र हैं,
धूर्तता स्वतंत्र है,
कहो! क्या राष्ट्र देवियों की,
अस्मिता स्वतंत्र है,
एकता का यंत्र है,
लोकतंत्र है बँधा,
स्वतंत्र भीड़तंत्र है,
स्वतंत्रता दिवस अधिक समय नहीं मनाओगे।
प्रेषक: अभिनव @ 8/14/2018 0 प्रतिक्रियाएं
हुई गा प्रेम
Feb 14, 2017प्रेम सहज विस्तार है, प्रेम दिवस बाज़ार,
प्रेम दिवस बाज़ार, माँगती पत्नी छल्ला,
फूल लिए गलियन में घूमें लल्ली लल्ला,
कह अभिनव कविराय आज कल किस पे टेम,
कार्ड धरो, चकलेट चरो, बस हुई गा प्रेम।
प्रेषक: अभिनव @ 2/14/2017 0 प्रतिक्रियाएं
वसंत आया
Feb 12, 2017मौसम बदलावा जाई, बसंत का लावा जाई,
मामा का बचावा जाई, कविता रचावा जाई,
बढ़ियाँ से गावा जाई, नई नई दुल्हिन लावा जाई,
दुल्हिन का समुझावा जाई, चावल बनवावा जाई,
हम तुम खावा जाई, केहुक न खेवावा जाई।
प्रेषक: अभिनव @ 2/12/2017 0 प्रतिक्रियाएं
वैलेंटाइन और भाईसाहब!
भाईसाहब सड़क किनारे के ढाबे पर बैठे बन बटर समोसा चबा रहे थे, हाथ में चाय का गिलास था, गिलास में उतनी ही चाय थी जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि यह गिलास अभी खाली नहीं हुआ है और एक अंतिम चुस्की अभी और मारी जा सकती है। मुख के एक कोने में विल्स फ़िल्टर ब्रांड की सिगरेट भी शोभायमान हो रही थी। सिगरेट जल रही थी और उसके धुंए नें भाईसाब के चेहरे पर एक कोहरा सा मचा रखा था। भाईसाहब फोन पर किसी से बतिया भी रहे थे अथवा कोई फ़िल्मी गीत या अपने 'मन की बात' सुन रहे थे, क्योंकि काले काले चश्मे के पीछे से एक सफ़ेद सफ़ेद तार उनके कानों में जा रहा था। इन सभी गतिविधियों के साथ उनका चौकस ध्यान सड़क पर गुज़रने वाले प्रत्येक सजीव निर्जीव तत्व पर था। उनके चरण कमल किसी ड्रम बजाने बाले के पैरों की भांति एक लय में धरती को ठकठका रहे थे। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था मानो वैज्ञानिकों को मल्टी-प्रसेसिंग प्रणाली का विचार उनकी छवि निहार कर ही आया हो। तभी अचानक दूर से एक पीले सूट की झलक देख कर भाई साहब का पुर्जा पुर्जा टेस्ला मोटर हो गया, एक कौर में बचा हुआ बन मुंह में ठूंसा गया, एक घूँट में चाय गटकी गई, सिगरेट बुझी, कान से तार निकले, चरण थपथपावन बंद हुआ और झट से पैंट की जेब से कंघी निकाल कर उन्होंने अपनी ज़ुल्फ़ सँवारी। पीले सूट में व आ रही थीं जिन्हें भाई साहब पिछले वैलेंटाइन से अपने वैलेंटाइन के रूप में मान चुके थे। हांलाकि यह बात उनके कुछ घनिष्ठ मित्रों के अलावा किसी को पता नहीं थी। आज पुनः वैलेंटाइन डे था, भाईसाहब गुलाब का फूल भी लाये थे, करीने से अपनी टीशर्ट के ऊपर के बटन में फंसा रखा था, ताकि निकाल कर देने में आसानी हो। वे निकट आ रही थीं, और भाईसाहब की हृदय गति, अच्छे दिनों में बनने वाली बुलेट ट्रेन की गति से भी ज़्यादा तेज़ हो चुकी थी। "यदि आज न हुआ तो कभी न हो पाई" वाली तर्ज पर उन्हें ये कदम उठाना ही था। और उन्होंने उठाया भी, वे कदम उठा कर देवीजी के सम्मुख पहुंचे और हड़बड़ाते हुए सीधे "आई लव यू" नामक मन्त्र जप दिया। देवी जी के हाव भाव से ऐसा लगा मानो उन्हें भी इस बात का अंदाजा था। उन्होंने बड़े परिष्कृत अंदाज़ में इस प्रेम प्रस्ताव को मित्रता प्रस्ताव में बदलते हुए पुष्प स्वीकार कर लिया। उस दिन के बाद से भाईसाहब कभी कार्ड के स्टोर में, कभी नकली गूची के शोरूम में, कभी टिकटों की लाइन में और कभी ग़ालिब की ग़ज़लों के साथ पाए जाते हैं। अब वे ढाबे पर चाय पीते नहीं दिखते। हमारे मंचों के प्रिय व्यंग्यकार माननीय संपत सरल जी ने ठीक ही कहा है कि, "वैलेंटाइन डे सोने का वो हिरन है जिसे तीर बेचने वाली कंपनी नें मार्किट में छोड़ रखा है'।
#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य, #vyangy
प्रेषक: अभिनव @ 2/12/2017 0 प्रतिक्रियाएं
पुनः ब्याह रचाओगी
Jan 31, 2017यह अपने संबंध के, सब वर्षों का सार।
मानो ग्यारह माह मात्र ही बीते हों,
ग्यारह माह भी कुछ ज्यादा ही लगते हैं,
मानो ग्यारह दिवस मात्र ही बीते हों,
ग्यारह दिवस न न न चंद घंटे केवल,
या मानो कि मिनट ग्यारह बीते हों,
ग्यारह सेकेंडों की ही गाथा लगती है,
जब तुमने अपनी वरमाला डाली थी,
लेकर हाथों में एक ताज़ा सुर्ख गुलाब,
अब भी मेरा मन करता है, मैं बोलूँ,
ओ मेरे बच्चों की प्यारी सी मम्मी,
क्या तुम मुझसे पुनः ब्याह रचाओगी।
प्रेषक: अभिनव @ 1/31/2017 0 प्रतिक्रियाएं
भस्मासुर
वे सभी,
जिन्हें ज़रा सी आहट पर,
सताने लगती है वैचारिकता की कब्ज़,
किसी के छींकने पर,
होने लगता है असहिष्णुता का भ्रम,
अग्रवाल कालेज में नहीं पढ़वाते हैं अपने बच्चों को,
न ही रुकते हैं महाराजा अग्रसेन के नाम पर बनी किसी धर्मशाला में,
योगा को जो समझते हैं,
ब्राह्मणों की साज़िश,
राम को समझते हैं,
सिर्फ क्षत्रियों का राजा,
बाबा रामदेव के हर उत्पाद को,
जो मिटा देना चाहते हैं उसकी जड़ से,
हाय जाति, हाय जाति करते इन लोगों को,
दिखाई नहीं देती,
अपने घर में रहने वाले,
कश्मीरी शरणार्थियों की पीड़ा,
उफ़! ये बुद्धिजीवी, वामपंथी और महान विचारक,
इस गर्त के ज़िम्मेदार ये भी हैं,
दलितों और मुसलामानों को चारा समझने वाले ये लोग,
मानव के रूप में साक्षात भस्मासुर हैं।
प्रेषक: अभिनव @ 1/31/2017 0 प्रतिक्रियाएं




