Help Ishaan make a difference!

Sep 15, 2026

Help Ishaan make a difference!
KINDNESS
FUNDRAISER
Hoffmann Elementary School
Hi Abhinav,

I'm excited to be participating in my school's Kindness Fundraiser and I would appreciate your support! We are raising funds for campus improvements, schoolwide activities and student & teacher resources. 

I'll be spending the next two weeks passing on your generosity by completing Acts of Kindness at school, at home and in my community. 

Would you please be willing to make a donation to support me and Hoffmann Elementary School? Every donation, big or small, makes a difference! 

Thanks so much,

Ishaan
3435 Harris Dr, Northbrook, IL 60062
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डॉ. उर्मिलेश: शब्दों में जीवित, स्मृतियों में आलोकित

Jul 7, 2026


कुछ व्यक्तित्व जीवन में केवल मिलते नहीं, वे भीतर कहीं स्थायी रूप से बस जाते हैं। डॉ. उर्मिलेश शंखधार जी मेरे लिए ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। साहित्य के विराट आकाश में वे ओज, गीत, ग़ज़ल और वाचिक परंपरा के तेजस्वी नक्षत्र थे, पर मेरे मन में उनकी स्मृति केवल एक बड़े कवि के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मीय प्रेरक, स्नेहिल मार्गदर्शक और गरिमामयी उपस्थिति के रूप में अंकित है।

मुझे आज भी वह समय याद है जब मैं बरेली के रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय का छात्र था और कविता की दुनिया मुझे अपनी ओर खींच रही थी। विश्वविद्यालय के कवि सम्मेलन में डॉ. उर्मिलेश जी से पहली भेंट हुई। मेरे काव्य पाठ के बाद उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और बदायूँ आने को कहा। वह बुलावा केवल एक वरिष्ठ कवि का निमंत्रण नहीं था, वह मेरे भीतर के कवि को पहचान लेने वाली दृष्टि थी।
एक रविवार मैं बरेली से बस पकड़कर बदायूँ पहुँचा और उनके घर गया। वहाँ चाय-नाश्ते के आत्मीय क्रम के बीच मैंने अपनी कविताएँ सुनाईं। उन्होंने स्नेहपूर्वक अपनी पुस्तकें भेंट कीं और फिर अपने पूज्य गुरुदेव डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी जी तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया। उस दिन मुझे लगा कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, संस्कारों की परंपरा भी है। यदि डॉ. उर्मिलेश जी का वह स्नेहिल आग्रह न मिला होता, तो शायद मेरे भीतर लिखने का वह विश्वास इतनी गहराई से न जागता।
बाद में उनकी सुपुत्री और सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. सोनरूपा विशाल जी के विवाह में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। आज भी वह विवाह मेरे जीवन में देखे गए सबसे सुंदर, आत्मीय और अविस्मरणीय वैवाहिक आयोजनों में से एक है। कुछ वर्ष पूर्व श्रेष्ठ कवि कुलदीप अंगार जी द्वारा आयोजित काव्य-संध्या में जब डॉ. सोनरूपा विशाल जी और उर्मिलेश जी के सुपुत्र अक्षत जी से भेंट हुई, तो वह क्षण भी मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। उनके घर “सृजन” में फिर से जाना मानो स्मृतियों के उसी आँगन में लौट जाना था, जहाँ कभी उनकी उपस्थिति, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद अनुभव किया था। डॉ. उर्मिलेश जी के परिजनों के प्रति भी मन में गहरी कृतज्ञता है, जिन्होंने उनकी स्मृतियों और साहित्यिक विरासत को इतने स्नेह और सम्मान के साथ संजोकर रखा है।
डॉ. उर्मिलेश जी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे मंच के शिखर पर खड़े होकर भी नए रचनाकारों को हाथ पकड़कर ऊपर लाने का साहस रखते थे। उनकी वाणी में राष्ट्र का स्वाभिमान था, पर हृदय में सहज मानवीयता। वे ओज के कवि थे, पर संवेदना से रिक्त नहीं। वे गीतकार थे, ग़ज़लकार थे, मंच पुरुष थे, पर सबसे बढ़कर वे ऐसे मनुष्य थे जिनसे मिलकर व्यक्ति अपने भीतर कुछ अच्छा बचा हुआ महसूस करता था।
एक बार वे मेरे स्वप्न में आए। वह स्वप्न नहीं, जैसे सचमुच उनका आना था। मैं जागा तो भीतर एक अजीब शांति थी, जैसे उन्होंने फिर वही कहा हो कि चलते रहो, लिखते रहो, थको मत। उनकी कही पंक्ति आज भी मन को सहारा देती है, “इतना आदी हुआ हूँ चलने का, बैठते ही थकान होती है।” यह केवल शेर नहीं, उनका जीवन-दर्शन था।
आज उनकी 75वीं जन्मजयंती पर जब उन्हें स्मरण करता हूँ, तो लगता है कि वे कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शब्दों में हैं, अपने संस्कारों में हैं, अपने शिष्यों और प्रियजनों की स्मृतियों में हैं। वे हर उस व्यक्ति में जीवित हैं जिसे उन्होंने लिखने, सोचने और मनुष्य बने रहने की प्रेरणा दी।
डॉ. उर्मिलेश को नमन। एक कवि को ही नहीं, एक आलोक पुरुष को नमन।

गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १

Jun 29, 2026



गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशम् ।
(सत्यम् + ज्ञानम् + अनन्तम् + नित्यम् + अनाकाशम् + परम + आकाशम्)
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम् ॥
(गोष्ठ + प्राङ्गण + रिङ्खण + लोलम् + अनायासम् + परम + आयासम्)
मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारम् ।
(माया + कल्पित + नाना + आकारम् + अनाकारम् + भुवन + आकारम्)
क्ष्मायानाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥
(क्ष्मायाः + नाथम् + अनाथम् + प्रणमत + गोविन्दम् + परम + आनन्दम्)
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सत्यम् – Absolute Truth; Ultimate Reality
ज्ञानम् – Pure Consciousness
अनन्तम् – Infinite; Endless
नित्यम् – Eternal
अनाकाशम् – Beyond space; Not limited by space
परम – Supreme
आकाशम् – Space; Ether
परमाकाशम् – The Supreme, Infinite Consciousness
गोष्ठ – Cowherd settlement
प्राङ्गण – Courtyard
रिङ्खण – Crawling
लोलम् – Delighting in
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलम् – Delighting in crawling through the courtyards of Gokula
अनायासम् – Effortlessly
परमायासम् – Great effort
माया – Divine power
कल्पित – Projected
नाना – Many
आकारम् – Forms
मायाकल्पितनानाकारम् – Appearing in countless forms through Māyā
अनाकारम् – Formless
भुवनाकारम् – Whose form is the entire universe
क्ष्मायाः – Of the Earth
नाथम् – Lord; Protector
क्ष्मायानाथम् – Lord of the Earth
अनाथम् – Independent; Protector of the helpless
प्रणमत – Bow down
गोविन्दम् – Govinda
परमानन्दम् – Supreme Bliss

बवंडर

Sep 25, 2025

 

क्रन्तिकारी मित्र झूठे अभियोग तान कर,
अपने चरित्र का प्रमाण दिखलाते हैं|
पहले से फैसले पे मोहर लगाय कर,
बाद में अदालत का खेल दिखलाते हैं|
विघ्नसंतोषी जन न्याय के प्रतीक बन,
आभासी नगरीया में गाल बजवाते हैं।
ऐसे महानुभावों को दूर ही से है प्रणाम,
बात बिना बात जो बवंडर मचाते हैं|


एक गीत - हाल कैसा है हमारा

Sep 24, 2025




रेत मुट्ठी से फिसलती जा रही है,
लौटने को है लहर छूकर किनारा।।
आसमाँ के चाँद तारे पूछते हैं,
क्या बताएं हाल कैसा है हमारा।।

कहने को हम साथ हैं, लेकिन कहाँ हैं,
बढ़ रही हर बात पर अब दूरियाँ हैं।
दुनिया वालों को दिखाकर हँस रहे हैं,
मन के भीतर ये प्रदर्शन धँस रहे हैं।
दो किनारों पर महोत्सव सज रहे हैं,
मौन है गहराई में नदिया की धारा।।

मन की पूछो बात तो हम अनमने हैं,
स्वप्न सब बिखरे अधूरे अधबने हैं।
दर्द ने ही दोस्ती कर ली दवा से,
छत पे जलता दीप कहता है हवा से।
हो सके तो तुम ही मेरा साथ दे दो, 
डोर नाज़ुक है नहीं दिखता सहारा।।  

मुस्कुराना लग रहा अपवाद तुमको, 
दोष मेरे हैं हज़ारों याद तुमको।
क्या कभी उल्लास के क्षण भी यहाँ थे,
थे यदि तो किस जगह, आखिर कहाँ थे।
जाने क्यों धुंधला सा होता जा रहा है, 
झिलमिलाता दिख रहा था जो सितारा।। 

तन को उलझाया है झूठे अनुकरण में,  
और मन अटका तुला के संतुलन में।
क्या प्रयोजन है भला इस प्रज्ज्वलन का,
क्या यही उद्देश्य था अपने मिलन का।
दम्भ की दीवार ऊँची उठ रही है,
प्रेम की गंगा है या सागर है खारा।।

रामधारी सिंह "दिनकर"

Sep 23, 2025

 

‘उर्वशी’ में शृंगार, ‘संस्कृति’ में विचार,
'कुरुक्षेत्र' लिख 'हुंकार' को जगा गए|
‘रश्मिरथी’ से गूँज उठी न्याय की पुकार,
अन्याय के विरुद्ध युद्ध बरपा गए|
भाषा को संवार, रस छंद अलंकार भर,
कविता की देहरी पे दीपक जला गए|
मन के अंधेरों को बुहार कर दिनकर,
भारत की आत्मा से परिचय करा गए|


नवरात्रों की शुभकामनाएं!

Sep 22, 2025



 
शैलपुत्री बल का प्रताप दिखला रही हैं,
ब्रह्मचारिणी माँ तप तेज बिखरा रहीं|
चंद्रघंटा वीरता को, कुष्मांडा सृजन को,
स्कंदमाता ममता को उमगा रहीं|
कात्यायनी हैं रण ज्वाल कालरात्रि माँ
महागौरी शांति के दीपक जला रहीं|
सिद्धिदात्री माँ ज्ञान, नवदुर्गा महान,
बल और करुणा से दुनिया चला रहीं।

नीचे बादल, ऊपर हम हैं

Sep 12, 2025

 

कई साल पहले तीन कवियों ने वाशिंगटन राज्य के ओलम्पिक नेशनल पार्क की बर्फ़ीली पहाड़ियों पर कदम रखा। ठंडी हवाओं और चमचमाती बर्फ़ के बीच अचानक ही कुछ पंक्तियाँ उनके होंठों पर उतर आईं। उन पंक्तियों में न जाने क्यों उस पूरे क्षण का सार समा गया था। बादलों के नीचे होते हुए भी मनुष्य की आत्मा गगन से ऊँची है—यह विश्वास पर्वत, आकाश और डूबते सूरज सबके साक्षात् खड़ा था। वह दृश्य केवल आँखों को ही नहीं, आत्मा को भी छू रहा था। मानो प्रकृति ने उस क्षण अपनी भाषा में गीत प्रवाहित किया हो।
 
नीचे बादल, ऊपर हम हैं,
हम क्या नील गगन से कम हैं।
नीचाई का जग में शासन,
ऊँचाई पाती निर्वासन,
हिम शिखरों पर जमा चुकी है,
शीतलता अपना पद्मासन,
चन्दन की गंधों से सुरभित,
हम खुशबू वाले मौसम हैं।

भारत की धड़कन

Sep 9, 2025

भारत की धड़कन


 जहाँ गंगा जमुना सरस्वती का पावन संगम होता है,
जहाँ मातु यशोदा की गोदी में झूल कन्हैया सोता है,
जहाँ रामचरितमानस के स्वर गलियों में गूंजा करते हैं,
तुलसी-कबीर-रसखान-सूर घर घर में पूजा करते हैं|

जहाँ चैती, कजरी, बिरहा, आल्हा, सावन गाया जाता है,
अवधी, बुंदेली, भोजपुरी, ब्रज रंग सजाया जाता है,
जहाँ एक तरफ हैं गीता प्रेस अक्षर पढ़ना सिखलाते हैं,
दूजे हैं बांके पहलवान कुश्ती लड़कर दिखलाते हैं|

साड़ी, चूड़ी, खुशरंग इत्र संग सुरमा और कटारी हैं,
पीतल, नक्काशी, जरदोज़ी, ताले, कालीन हमारी हैं,
जहाँ ताजमहल की श्वेत धरोहर प्रेम रंग बिखराती है,
नित पान की लाली होठों पर मुस्कान सुरीली लाती है|

बम भोले, हर हर महादेव की काशी जहाँ सुशोभित है,
वह धरती जिसकी जगमग से जगपालक तलक अचंभित है,
मेरठ है, मंगल पांडे हैं, झाँसी है, लक्ष्मी रानी हैं,
आज़ाद, पथिक, बिस्मिल, टंडन, अशफाकुल्ला, मोहानी हैं|

बिस्मिल्ला की शहनाई जहाँ सुबह को पुकारा करती है,
हर शाम ए अवध तहज़ीबों की ज़ुल्फ़ों को संवारा करती है,
तुमको लगता है, बस धोती, गमछा और अचकन रहती है,
मुझको लगता है यू पी में भारत की धड़कन रहती है।


सिन्दूरी सी सुबह

May 20, 2025

 


हनुमान जी की पूँछ जो जलाई रावण ने,

लंका नगरी हेतु महाविपात हो गई।

आधी रात में ही सिन्दूरी सी सुबह हुई,

सुबह जो हुई दुष्टों की रात हो गई।

तुर्क, चीन, पाक — सब पुतले दहन हुए,

धूल धसरित सारी चौधरात हो गई।

"जय हिंद" की ध्वनि से गूंजने लगा गगन,

भारती की आरती की शुरुआत हो गई।


जय हिन्द की सेना! जय हिन्द!

महाराजा अग्रसेन आपको प्रणाम है।

May 14, 2025



 सूर्यवंश का धवल तेज बिखराने वाले,

महाराज वल्लभ के प्रताप को प्रणाम है।

वीरभूमि अग्रोहा जी को है नमन नित,

महालक्ष्मी के दिव्य जाप को प्रणाम है।

‘एक टका, एक ईंट’ धन्य धन्य रही रीत,

व्यक्ति से समाज के मिलाप को प्रणाम है|  

शांति, तप, त्याग, तेज, ज्ञान के परम धाम,

महाराजा अग्रसेन आपको प्रणाम है।

आपरेशन सिन्दूर - चार दिन चार छंद

May 11, 2025





मज़हब पूछ कर आग बरसाने वालों,

शौर्य देख के घमंड चूर चूर हो गया| 

चीन-अमरीका-तुर्क कोई न किसी का सगा,

आशा है हर एक भ्रम दूर दूर हो गया| 

सोफिया की व्योमिका की, बात सुनें बिटिया की,

पाप का घड़ा हुज़ूर, भरपूर हो गया| 

प्रीत वाली रीत संग, भरा था जो लाल रंग,

बन के सिन्दूर वही मशहूर हो गया| 


महाराज विक्रम का नाम बतलाता हमें,

न्याय का सदैव अधिपत्य होना चाहिए| 

कपटी कुटिल छली असुरों का विष दल,

इनका दलन अब नित्य होना चाहिए|

खैबर, बलूच, सिंधु की करुण  है पुकार, 

खंड खंड कर कृत कृत्य होना चाहिए| 

सज्जनों को यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण करने को,

दुर्जनों का राम नाम सत्य होना चाहिए।


नई तकनीक वाला नए युग का है युद्ध,

नई चाल चल नए रंग भी दिखायेगा| 

पश्चिम जो दे रहा है दुष्ट पाक को उधार,

हथियारों का भी इंतज़ाम करवाएगा| 

गूगल का सीईओ न माईक्रो सॉफ्ट वाला,

अजयपाल ट्रम्प न पटेल काम आएगा| 

खेत की कटाई हेतु स्वयं भिड़ना पड़ेगा,

बाहर से आके कोई हाथ न बंटाएगा| 


घर के पड़ोस में हो ज़हरीला नाग यदि,

फन भी उठाएगा, डसेगा, इतराएगा।

आप भले सत्तरह बार दें खदेड़ उसे,

दुष्ट है, वो बार-बार लौट कर आएगा।

उसको तो जीतना है सिर्फ एक बार, 

साम दाम दंड भेद सब आज़मायेगा| 

धर्म युद्ध है यह, इसे नीति न तोलियेगा,

शास्त्र को भी अंततः शस्त्र ही बचाएगा।


- अभिनव शुक्ल  

एक आत्मसमर्पण गीत

Apr 24, 2025

 


















चाहे छुप कर करो धमाके, या गोली बरसा जाओ,
हम हैं भेड़ बकरियों जैसे, जब जी चाहे खा जाओ।

किसको बुरा कहें हम आख़िर किसको भला कहेंगे,
जितनी भी पीड़ा दोगे तुम सब चुपचाप सहेंगे,
डर जायेंगे दो दिन को बस दो दिन घबरायेंगे,
अपना केवल यही ठिकाना हम तो यहीं रहेंगे,
तुम कश्मीर चाहते हो तो ले लो मेरे भाई,
नाम राम का तुम्हें अवध में देगा नहीं दिखाई,
शरियत का कानून चलाओ पूरी भारत भू पर,
ले लो भरा खजाना अपना लूटो सभी कमाई,
जय जिहाद कर भोले मासूमों का खून बहा जाओ,
हम हैं भेड़ बकरियों जैसे, जब जी चाहे खा जाओ।

वंदे मातरम् जो बोले वो जीभ काट ली जाए,
भारत को मां कहने वाले को फांसी हो जाए,
बोली में जो संस्कृत के शब्द किसी के आयें,
ज़ब्त कर संपत्ति उसकी तुरत बाँट ली जाए,
जो जनेऊ को पहने वो हर महीने जुर्माना दे,
तिलक लगाने वाला सबसे ज़्यादा हर्जाना दे,
जो भी होटल शाकाहारी भोजन रखना चाहे,
वो हर महीने थाने में जा कर के नजराना दे,
मन भर के फरमान सुनाओ जीवन पर छा जाओ,
हम हैं भेड़ बकरियों जैसे, जब जी चाहे खा जाओ।

यदि तुम्हें ये लगता हो हम पलट के वार करेंगे,
लड़ने की खातिर तलवारों पर धार करेंगे,
जो बेबात मरे हैं उनके खून का बदला लेंगे,
अपने मन के संयम की अब सीमा पार करेंगे,
मुआफ़ करो हमको भाई तुम ऐसा कुछ मत सोचो,
तुम ही हो इस युग के नायक चाहे जिसे दबोचो,
जब चाहो बम रखो नगरी नगरी आग लगाओ,
असहाय सी गाय सा देश है इसको मारो नोचो,
हिंदू सिख इसाई मुस्लिम दंगे भी भड़का जाओ,
हम हैं भेड़ बकरियों जैसे, जब जी चाहे खा जाओ।

हमको फुर्सत नहीं अभी है आपस में लड़ने से,
कर्नाटक, पंजाब, मराठा, बंगाली करने से,
तुम गज़वा ए हिंद करो, फिर पाकिस्तान बनाओ,
औरंगज़ेबी शासन का परचम फिर से लहराओ,
जात पात में बँटे हुए हम भारत के वासी हैं,
एक बार मर गए तो फिर जन्मेंगे अविनाशी हैं,
हाथ पे रख कर हाथ राह तकेंगे अवतारों की,
वो आएँगे, निपटेंगे, सुध लेंगे बेचारों की, 
तब तक अपनी नफरत को तुम हम पर बरपा जाओ,
हम हैं भेड़ बकरियों जैसे, जब जी चाहे खा जाओ।

नेहरू जी के निधन पर अटल जी के श्रद्धासुमन।

Aug 18, 2018

नेहरू जी के निधन पर अटल जी के श्रद्धासुमन।
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अध्यक्ष महोदय,
एक सपना था जो अधूरा रह गया। एक गीत था जो गूँगा हो गया। एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गयी। सपना था, एक ऐसे संसार का, जो भय और भूख से रहित होगा। गीत था, एक ऐसे महाकाव्य का, जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गन्ध थी। लौ थी, एक ऐसे दीपक की, जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
मृत्यु ध्रुव है। शरीर नश्वर है। कल, कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ाकर आये, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोये पड़े थे, जब पहरेदार बेख़बर थे, तब हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गयी। भारत माता, आज शोकमग्ना है - उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता, आज खिन्नमना है - उसका पुजारी सो गया। शान्ति, आज अशान्त है - उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन-जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अन्तिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बन्ध में कहा है कि वे असम्भवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शान्ति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे। वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें, तब एक दिन, मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो वो बिगड़ गये और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वो बातचीत करने के खिलाफ़ थे।
महोदय,
जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुकाकर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएँ प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से, इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया। अनुयायी रह गये। सूर्य अस्त हो गया। तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है। यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें, एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद, तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा। वह व्यक्तित्व, वह ज़िन्दादिली, विरोधी को भी साथ लेकर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रमाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
- अटल बिहारी वाजपेयी, 29 मई 1964, लोकसभा

भीड़तंत्र

Aug 14, 2018

जात पात है स्वतंत्र,
नफरतें स्वतंत्र हैं,
छद्म वेष में स्वतंत्र,
दुष्टता के मंत्र हैं,
यत्र तत्र क्रूरता है,
धूर्तता स्वतंत्र है,
कहो! क्या राष्ट्र देवियों की,
अस्मिता स्वतंत्र है,
जंग खा रहा हमारी,
एकता का यंत्र है,
लोकतंत्र है बँधा,
स्वतंत्र भीड़तंत्र है,
जो भीड़तंत्र से इसे स्वतंत्र न कराओगे,
स्वतंत्रता दिवस अधिक समय नहीं मनाओगे।
© अभिनव शुक्ल

हुई गा प्रेम

Feb 14, 2017

'प्रेम लेऊ जी प्रेम लेऊ', मचल हौ चीख़ पुकार,
प्रेम सहज विस्तार है, प्रेम दिवस बाज़ार,
प्रेम दिवस बाज़ार, माँगती पत्नी छल्ला,
फूल लिए गलियन में घूमें लल्ली लल्ला,
कह अभिनव कविराय आज कल किस पे टेम,
कार्ड धरो, चकलेट चरो, बस हुई गा प्रेम।

वसंत आया

Feb 12, 2017

वसंत आया तो उसके आते ही फ़ेसबुक पर उसका ज़ोरदार स्वागत होने लगा। मेरे प्यारे प्यारे सहेले - सहेलियाँ अपनी अपनी वाल पर ऋतुराज की उपाधि को जस्टिफाई करने लगे। और इधर ट्रंप बाबू भी अपने द्वारा बनाई जाने वाली वॉल को बसंती रंग में रंगने पर सहमत हो गए। ट्रंप के विरोधी भी बसंती चोला धारण कर सड़कों पर उतर पड़े। टीवी चैनलों के ढपोरसंख पत्रकार चीख़ चिल्ला कर जब थक गए, तब बसंत पर होने वाले कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग कर वासंती अनुभव करने लगे। धार्मिक एकता के बचे खुचे पैरोकार अमीर खुसरो का नाम ले सबको बरगलाने में तत्पर हो गए कि बसंत हिंदू मुस्लिम एकता के लिए आया है। वामपंथ की फिसलौंध भरी गलियों के वासी, बसंत को मिली ऋतुराज की उपाधि को अन्य ऋतुओं का षड्यंत्र बताते हुए इसके विरोध में अपने पुरुस्कार लौटा कर कृतकृत्य होने लगे। कामदेव इस सोच में व्यस्त हो गए कि इस बसंत कौन से प्रोडक्ट द्वारा अपना प्रचार बढ़ाया जाए। चिड़िया सरसों के खेत में उड़ते हुए भोजन हेतु केंचुओं का शिकार करने लगी। माँ शारदा के भक्त पंचम स्वर में सरस्वती वंदना गाने लगे। ऐसे में अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य के मध्य बसे फोलसम नगर में वास करने वाले एक नितांत मासूम से भोले भाले प्रवासी भारतीय ने फ़ेसबुक पर बसंत के स्वागत में बनने वाले मीठे पीले ड्राई फ़्रूट एवं नरियर मिक्स चावलों का वर्णन पढ़ अपनी पत्नी से उन चावलों को पकाने हेतु आवेदन दिया। पत्नी ने भी तुरंत ऐसी किसी भी वस्तु के संसार में पकने की बात से अनभिज्ञता ज़ाहिर करते हुए उसकी रेसिपी न जानने की बात करते हुए आवेदन निरस्त कर दिया। इसके उपरांत बड़ी मेहनत और अनेक क्लिक के उपरांत वसंत के पीले चावलों की विधि अंतर्जाल पर ढूँढ कर पति ने स्वयं उन्हें बना कर अपना वसंत मनाया। ज्ञानीजन ठीक ही कह गए हैं कि वसंत आता नहीं उसे पकड़ के लाना पड़ता है। तभी एक नन्हें देवदूत को वाट्स अप पर निम्न कविता पढ़ते देखा तो लगा सचमुच बसंत आ गया।
ओढ़ दुसाला चंदा मामा, ठिठुर ठिठुर कर भए पजामा,
मौसम बदलावा जाई, बसंत का लावा जाई,
मामा का बचावा जाई, कविता रचावा जाई,
बढ़ियाँ से गावा जाई, नई नई दुल्हिन लावा जाई,
दुल्हिन का समुझावा जाई, चावल बनवावा जाई,
हम तुम खावा जाई, केहुक न खेवावा जाई।

वैलेंटाइन और भाईसाहब!



भाईसाहब सड़क किनारे के ढाबे पर बैठे बन बटर समोसा चबा रहे थे, हाथ में चाय का गिलास था, गिलास में उतनी ही चाय थी जिसके आधार पर ये कहा जा सके कि यह गिलास अभी खाली नहीं हुआ है और एक अंतिम चुस्की अभी और मारी जा सकती है। मुख के एक कोने में विल्स फ़िल्टर ब्रांड की सिगरेट भी शोभायमान हो रही थी। सिगरेट जल रही थी और उसके धुंए नें भाईसाब के चेहरे पर एक कोहरा सा मचा रखा था। भाईसाहब फोन पर किसी से बतिया भी रहे थे अथवा कोई फ़िल्मी गीत या अपने 'मन की बात' सुन रहे थे, क्योंकि काले काले चश्मे के पीछे से एक सफ़ेद सफ़ेद तार उनके कानों में जा रहा था। इन सभी गतिविधियों के साथ उनका चौकस ध्यान सड़क पर गुज़रने वाले प्रत्येक सजीव निर्जीव तत्व पर था। उनके चरण कमल किसी ड्रम बजाने बाले के पैरों की भांति एक लय में  धरती को ठकठका रहे थे। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था मानो वैज्ञानिकों को मल्टी-प्रसेसिंग प्रणाली का विचार उनकी छवि निहार कर ही आया हो। तभी अचानक दूर से एक पीले सूट की झलक देख कर भाई साहब का पुर्जा पुर्जा टेस्ला मोटर हो गया, एक कौर में बचा हुआ बन मुंह में ठूंसा गया, एक घूँट में चाय गटकी गई, सिगरेट बुझी, कान से तार निकले, चरण थपथपावन बंद हुआ और झट से पैंट की जेब से कंघी निकाल कर उन्होंने अपनी ज़ुल्फ़ सँवारी। पीले सूट में व आ रही थीं जिन्हें भाई साहब पिछले वैलेंटाइन से अपने वैलेंटाइन के रूप में मान चुके थे। हांलाकि यह बात उनके कुछ घनिष्ठ मित्रों के अलावा किसी को पता नहीं थी। आज पुनः वैलेंटाइन डे था, भाईसाहब गुलाब का फूल भी लाये थे, करीने से अपनी टीशर्ट के ऊपर के बटन में फंसा रखा था, ताकि निकाल कर देने में आसानी हो।  वे निकट आ रही थीं, और भाईसाहब की हृदय गति, अच्छे दिनों में बनने वाली बुलेट ट्रेन की गति से भी ज़्यादा तेज़ हो चुकी थी। "यदि आज न हुआ तो कभी न हो पाई" वाली तर्ज पर उन्हें ये कदम उठाना ही था। और उन्होंने उठाया भी, वे कदम उठा कर देवीजी के सम्मुख पहुंचे और हड़बड़ाते हुए सीधे "आई लव यू" नामक मन्त्र जप दिया। देवी जी के हाव भाव से ऐसा लगा मानो उन्हें भी इस बात का अंदाजा था। उन्होंने बड़े परिष्कृत अंदाज़ में इस प्रेम प्रस्ताव को मित्रता प्रस्ताव में बदलते हुए पुष्प स्वीकार कर लिया। उस दिन के बाद से भाईसाहब कभी कार्ड के स्टोर में, कभी नकली गूची के शोरूम में, कभी टिकटों की लाइन में और कभी ग़ालिब की ग़ज़लों के साथ पाए जाते हैं। अब वे ढाबे पर चाय पीते नहीं दिखते। हमारे मंचों के प्रिय व्यंग्यकार माननीय संपत सरल जी ने ठीक ही कहा है कि, "वैलेंटाइन डे सोने का वो हिरन है जिसे तीर बेचने वाली कंपनी नें मार्किट में छोड़ रखा है'।

#व्यंग्यकीजुगलबंदी, #व्यंग्य, #vyangy

पुनः ब्याह रचाओगी

Jan 31, 2017

बीस बरस तक़रार के, एक सदी का प्यार,
यह अपने संबंध के, सब वर्षों का सार।
ग्यारह वर्ष हुए किन्तु ये लगता है,
मानो ग्यारह माह मात्र ही बीते हों,
ग्यारह माह भी कुछ ज्यादा ही लगते हैं,
मानो ग्यारह दिवस मात्र ही बीते हों,
ग्यारह दिवस न न न चंद घंटे केवल,
या मानो कि मिनट ग्यारह बीते हों,
ग्यारह सेकेंडों की ही गाथा लगती है,
जब तुमने अपनी वरमाला डाली थी,
लेकर हाथों में एक ताज़ा सुर्ख गुलाब,
अब भी मेरा मन करता है, मैं बोलूँ,
ओ मेरे बच्चों की प्यारी सी मम्मी,
क्या तुम मुझसे पुनः ब्याह रचाओगी।

भस्मासुर

पूरे छब्बीस साल से मौन बैठे हैं,
वे सभी,
जिन्हें ज़रा सी आहट पर,
सताने लगती है वैचारिकता की कब्ज़,
किसी के छींकने पर,
होने लगता है असहिष्णुता का भ्रम,
अग्रवाल कालेज में नहीं पढ़वाते हैं अपने बच्चों को,
न ही रुकते हैं महाराजा अग्रसेन के नाम पर बनी किसी धर्मशाला में,
योगा को जो समझते हैं,
ब्राह्मणों की साज़िश,
राम को समझते हैं,
सिर्फ क्षत्रियों का राजा,
बाबा रामदेव के हर उत्पाद को,
जो मिटा देना चाहते हैं उसकी जड़ से,
हाय जाति, हाय जाति करते इन लोगों को,
दिखाई नहीं देती,
अपने घर में रहने वाले,
कश्मीरी शरणार्थियों की पीड़ा,
उफ़! ये बुद्धिजीवी, वामपंथी और महान विचारक,
इस गर्त के ज़िम्मेदार ये भी हैं,
दलितों और मुसलामानों को चारा समझने वाले ये लोग,
मानव के रूप में साक्षात भस्मासुर हैं।