बहुत पानी बरसने से नदी में बाढ़ आती है,
कोई बिटिया ज्यों अपने मायके को छोड़ जाती है,
घड़ी भी देखो, ले दे कर वही टाइम बताती है,
हमारे माथे पर अब तक ये मिट्टी जगमगाती है,
न जाने कौन सी भाषा में कोयल गीत गाती है.
Abhinav Shukla
206-694-3353
अलार्म बज बज कर, सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है, बाहर बर्फ बरस रही है, दो मार्ग हैं, या तो मुँह ढक कर सो जाएँ, या फिर उठें, गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ।
प्रेषक: अभिनव @ 12/07/2008 3 प्रतिक्रियाएं
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दिल्ली भी लाल हो गई जयपुर भी लाल है,
पीली पड़ी है देश की संसद कमाल है,
हम तुम भी बात कर के पीक देंगे पान को,
गरमा गरम ख़बर है सुनो बेमिसाल है,
फिर चोट लगी दर्द हुआ खून बहा है,
किसने किया? - इतिहास - क्लास दो - सवाल है,
हिन्दी मराठी जुगलबंदी बांसुरी पे है,
तबले पे तीन ताल है धुरपद ख्याल है.
प्रेषक: अभिनव @ 9/14/2008 5 प्रतिक्रियाएं
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सूचना आई फटा है आर्याव्रत में बम,
मुट्ठियाँ भींचे हुए बस देखते हैं हम,
नखलऊ, जैपूर, बंगलूरु, हईद्राबाद,
मुंबई, काशी, नै दिल्ली दम दमा दमदम,
बात ये पहुँची जब अपने हुक्मरानों तक,
हंस के बोले ग्लास में डालो ज़रा सी रम,
अब नियमित रूप से मौसम ख़बर के बाद,
बम की खबरें आ रही हैं देख लो प्रियतम,
आदमीयत हो रही है आदमी में कम,
पढ़ के लिख के बन गए हैं पूरे बेशरअम.
फर्क पड़ता ही नहीं कोई किसी को अब,
दुःख रहा फिर दिल हमारा आँख है क्यों नम,
हिंदू मुस्लिम लड़ मरें तो कौन खुश होगा,
सोच कर देखो मेरे भाई मेरे हमदम.
प्रेषक: अभिनव @ 7/26/2008 8 प्रतिक्रियाएं
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जो कुछ भी हुआ हो गुरु सरकार बच गई,
लगता था डूब जायगी मंझधार, बच गई,
मुद्दे को डीप फ्राई कर न पाई भाजपा,
हो तेल बचा या न बचा धार बच गई,
व्यापार में भी प्यार का आभास छिपा है,
गलियों में बहा हरा हरा प्यार बच गई,
सरदारजी कुछ और भले लगने लगे हैं,
कर ही दिया था पूरा आर पार बच गई.
प्रेषक: अभिनव @ 7/23/2008 4 प्रतिक्रियाएं
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मेरे नगर में आज कल पानी बरसता है बहुत,
सदियों पुराना पेड़ पर प्यासा तरसता है बहुत,
रोने की आवाजें मेरे कानों में फिर आने लगीं,
नेपाल नंदीग्राम में कोई तो हँसता है बहुत,
बहने दे थोडी साँस भी महंगाई के ओ देवता,
तू तो गले में डाल कर फंदे को कसता है बहुत,
नफरत के सिर पर बैठने का राजशाही पैंतरा,
कर तो रहा है काम पर ये नाग डसता है बहुत.
प्रेषक: अभिनव @ 5/08/2008 10 प्रतिक्रियाएं
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ये ग़ज़लें अपनी दुनिया में हमें यूँ खींच लेती हैं,
ज्यों माएँ अपने कमबख़्तों को बाँहों भींच लेती हैं,
कभी तो गाते गाते फूट कर हम रोने लगते हैं,
ये आँखें दिल की मुरझाती सी बगिया सींच लेती हैं,
ये ज़्यादा रोशनी बर्दाश्त तो कर ही नहीं पातीं
ज़रा तुम सामने आती हो खुद को मींच लेती हैं।
प्रेषक: अभिनव @ 10/06/2007 5 प्रतिक्रियाएं
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नफरत के बीज बो दिए खूनी फसल हुई,
समस्या अपने गाँव की कुछ ऐसे हल हुई,
दोनो तरफ के शातिर औ बदमाश बच गए,
इस बात में क्या रखा है किसकी पहल हुई,
पटना के प्लेटफार्म पे आ गई टाईम पे,
गाड़ी न हुई मुन्सीपाल्टी का नल हुई,
सबकी दुकानदारी है ले दे के एक सी,
पंजा हुई, हाथी हुई, सैकिल कमल हुई,
पापा की टीम में कभी मम्मी की टीम में,
मौके को देखकर यहाँ भी दलबदल हुई,
बेटा सेलेक्ट हो गया इंजीनियरिंग में,
ऐसा लगा माँ बाप की मेहनत सफल हुई,
न चाहते हुए भी तुम्हें देखता हूँ रोज़,
तू न हुई दैनिक का कोई राशिफल हुई,
जबसे तुम आई हो यहाँ पे बन के इक परी,
तबसे हमारी झोंपडी भी जलमहल हुई,
दिन उलझनों के बीच कटी करवटों में रात,
तब जा के कहीं शेर बने ये ग़ज़ल हुई,
प्रेषक: अभिनव @ 6/01/2007 8 प्रतिक्रियाएं
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मुझको भी अब गरीब औ' पिछड़ा बताइए,
अच्छी ख़बर भी कोई कभी तो सुनाइए,
ये जानना कठिन है कि मासूम कौन है,
हम सब ही गुनहगार हैं लाठी उठाइए,
नन्दी का ग्राम हो भले दौसा के रास्ते,
आवाम पे बेखौफ हो गोली चलाइए,
भरती हुई है आपकी सरकारी कौम में,
वर्दी की लाज आप भी थोड़ी बचाइए,
चशमा चढ़ा के ग़ौर से अख़बार देख कर,
चाय की प्यालियों से ही बातें बनाइए,
बोला, वो टिमटिमाता सा इक बल्ब नोंचकर,
'ये रेल बाप की है इसे बेच खाइए',
ये है हमारी सभ्यता ये अपना तौर है,
आना हो आइए यदि जाना हो जाइए,
धरती से जुड़े लोगों से तुम आज कट गए,
लिखने के लिए और भला अब क्या चाहिए,
हम सबमें बैठ कर के कोई पूछ रहा है,
"क्या ठीक है? ग़लत क्या?", भला क्या बताइए,
'इंसाफ की डगर पे', गीत सुन बड़े हुए,
सच है अगर ये बात तो चल कर दिखाइए।
प्रेषक: अभिनव @ 5/31/2007 5 प्रतिक्रियाएं
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पेड़ बरगद का कोई ढहने को बाकी न रहा,
बूढ़े घुटनों की कसक सहने को बाकी न रहा,
पीली गौरैया के घर के सारे बच्चे उड़ गए,
घोसलों में आदमी रहने को बाकी न रहा,
भयंकर सूखा पड़ा फिर भावना के खेत में,
एक मोती आंख से बहने को बाकी न रहा,
कल वो मेरे नाम को सुनकर ज़रा शरमाई थी,
अब ग़ज़ल में और कुछ कहने को बाकी न रहा।
प्रेषक: अभिनव @ 5/05/2007 4 प्रतिक्रियाएं
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हम गुनहगार हों, चाहे बीमार हों,
चाहे लाचार हों, चाहे बेकार हों,
जो भी हों चाहे, जैसे भी हों दोस्तों,
साथ ऐसे रहें, जैसे परिवार हों,
कुछ नियम से बहे स्वस्थ आलोचना,
हो दिशा सूर्योन्मुख सकारात्मक,
व्यर्थ में जो करे बात विघटनमुखी,
उससे क्या तर्क हों, आर हों, पार हों,
हम पढें, हम लिखें, सबसे ऊँचा दिखें,
ज़ोर पूरा लगाकर, वहीं पर टिकें,
उसपे ये शर्त रखी है सरकार नें,
फैसले सब यहीं बीच मंझधार हों,
ये भरोसा है हमको जड़ों पर अभी,
हमको आंधी से ख़तरा नहीं है मगर,
ये ज़रूरी है सबके लिए जानना,
कब रहें बेखबर, कब ख़बरदार हों,
शब्द हल्के रहें, चाहे भारी रहें,
भावनाओं के संचार जारी रहें,
अच्छे शायर बनें न बनें दोस्तों,
अच्छा इंसान बनने का आधार हों,
प्रेषक: अभिनव @ 4/19/2007 4 प्रतिक्रियाएं
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वक्त की झील में तस्वीर बना देती है,
दर्द दे दे के उम्मीदों की दुआ देती है,
कभी आंखों में सजाती है सुनहरे सपने,
कभी ख्वाबों के चिरागों को बुझा देती है,
दिन उगेगा तो ये सूरज की बाँह थामेगी,
अंधेरी रात में दीपक को जला देती है,
हर सबक कैद नहीं होता है किताबों में,
ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है।
प्रेषक: अभिनव @ 3/27/2007 4 प्रतिक्रियाएं
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खून बहाया मासूमों का फूलों और बहारों का,
देखा नहीं गया क्या तुमसे खुश रहना बेचारों का,
बात खु़दा तक पहुँच गई है जलने वाली बस्ती की,
आज इबादतगाहों में भी चर्चा है हथियारों का,
छोटे बच्चों को भी राम कहानी का अंदाज़ा है,
ताजपोशियाँ खेल सियासत धंधा है मक्कारों का,
इन खबरों की सच्चाई पर ऐतबार कैसे कर लें,
रोम रोम तो बिका हुआ है अब सारे अखबारों का,
एक कयामत नाज़िल होने वाली है जाने क्यूँ लगता है,
आज समन्दर तोड़ रहा दिल साहिल की दीवारों का,
ये मत सोचो उम्र बिताएगा कोई इस डेरे में,
आते जाना जाते जाना मज़हब है बंजारों का,
बालों की चांदी भी कैसे कैसे खेल दिखाती है,
हाल नहीं अब कोई पूछता हमसे इश्क के मारों का,
मेरे पीछे हंसने वाला मुझसे आकर कहता है,
कमज़ोरों की हंसी उड़ाना शौक है इज्जतदारों का,
तलवे चाट रहे थे अब तक जो बदनाम हुकूमत के,
वो फरमान सुनाएँगे अब लुटे हुए दरबारों का,
दफ्तर, बिजली, सड़कें, टीवी, चाय, फोन, चप्पल, जूता,
बच्चे, रोटी, पानी, कपड़ा किस्सा है घर बारों का,
आग मुहब्बत की जिसकी हर गाम हिफाज़त करती हो,
डर दिखलाता है उस 'अभिनव' को कैसे अंगारों का।
प्रेषक: अभिनव @ 2/20/2007 2 प्रतिक्रियाएं
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इधर मोहल्ले में मीडीया पर बढ़िया आलेख पढ़ने को मिला। उसी पर की हुई अपनी टिप्पणी यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ, साथ में एक ग़ज़लनुमा रचना भी है।
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आपका आलेख पढ़ा, अच्छा लगा ये देखकर की रोशनी की लौ पूरी तरह बुझी नहीं है। मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं। संभव है कि आपके द्वारा हमें कुछ सच्ची तथा अच्छी खबरें सुनने को मिलें। कहीं एक इतिहासकार की कहानी सुनी थी, एक बार उसके घर के बाहर कोई घटना घटी, जब वो बाहर आया तो उसने देखा कि बड़ी भीड़ लगी हुई है। उसने सोचा कि ज़रा पता किया जाए कि माज़रा क्या है तथा भीड़ के बाहरी घेरे पर खड़े एक सज्जन से पूछा कि भाई क्या हुआ है। पहले व्यक्ति नें उसे बताया कि दो लोग आपस में लड़ रहे हैं, वो भीड़ को चीर कर ज़रा अंदर पहुँचा और किसी दूसरे से यही प्रश्न किया, इस बार जवाब मिला कि किसी का कत्ल हो गया है, ज़रा और अन्दर पहुँचने पर उसे पता चला कि हत्यारे गोली मार कर मोटर सायकिल पर फरार हो गए हैं। जब वह आखिरकार घटनास्थल पर पहुँचा तो उसने देखा कि एक गाय नें एक बछड़े को जन्म दिया है और वो बछड़ा लड़खड़ा कर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। वापस आकर उन इतिहासकार महोदय नें अपनी लिखी सारी किताबें जला दीं और कहा कि जब मैं अपने घर के सामने २० मिनट पहले हुई घटना कि सत्यता नहीं प्रमाणित कर सकता तो सदियों पहले क्या हुआ था यह कैसे समाज पर थोप सकता हूँ। खैर, यह तो मात्र एक कथा थी, कौन जाने कितना सच, कितना झूठ किन्तु यह परम सत्य है कि खबर को गहराई से निकालना तथा यह पता लगाना कि गाय किस जाति की है तथा बछड़ा बड़ा होकर किस पार्टी को सपोर्ट करेगा बड़ा मुश्किल काम है। आपका लेख पढ़कर कुछ पंक्तिया बन पड़ी हैं नीचे प्रेषित कर रहा हूँ।
सुबह की ख़बर में ख़बर ढूँढता हूँ,
कभी दोपहर में ख़बर ढूँढता हूँ,
पचासों हैं चैनल हज़ारों रिसाले,
मगर मैं शहर में ख़बर ढूँढता हूँ,
नदी का तो चर्चा सभी कर रहे हैं,
मैं सूखी नहर में ख़बर ढूँढता हूँ,
कई साल पहले तबाही मची थी,
अभी तक लहर में ख़बर ढूँढता हूँ,
मेरे साथ आए भला कोई कैसे,
मैं जूठे ज़हर में ख़बर ढूँढता हूँ।
प्रेषक: अभिनव @ 2/12/2007 1 प्रतिक्रियाएं
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लुटी फिर बस है पन्द्रह आठ सैंतालिस नम्बर की,
फटी सीटें हैं कुछ गायब हुए हैं पेंच पहियों के,
मैं सुनता हूँ कि जीडीपी बढ़ा सनसेक्स उछला है,
हमारे घर के अन्दर हाल हैं बेहाल कइयों के,
कोई कहता है बीमारू कोई पिछड़ा बताता है,
भला सुधरेंगे दिन कैसे मेरे भारत में भइयों के,
वो सूखा पेड़ मुझसे कह रहा था एक दिन प्यारे,
कभी मेरी भी शाखों पर घरौंदे थे चिर्इयों के,
प्रेषक: अभिनव @ 12/29/2006 2 प्रतिक्रियाएं
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करो मत व्यर्थ जीवन का प्रबल आधार हो जाओ,
ना बन पाओ यदि तुम गुल, नुकीले ख़ार हो जाओ,
सुबह उठ कर नहाते हो औ पूजा पाठ करते हो,
अमाँ तुम आदमी अब हो गए बेकार हो जाओ,
चिलम को हाथ में लेकर लगाओ कश पे कश प्यारे,
चलो मूँदो ये आँखें डूब जाओ पार हो जाओ,
ज़रा पेटी कसो बंदूक की गोली भी चेक कर लो,
इलेक्शन आ रहे हैं दोस्तों, तैयार हो जाओ,
प्रेषक: अभिनव @ 12/28/2006 5 प्रतिक्रियाएं
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पहले तो बात सुन के ज़रा डोलते हैं हम,
फिर एक एक करके पर्त खोलते हैं हम,
कुछ मूल जानने की लगाते हैं हम जुगत,
कुछ उसमें छुपे सत्य को टटोलते हैं हम,
जब लगता है ये बात सुनाने के योग्य है,
भाषा की चाशनी में भाव घोलते हैं हम,
कसते हैं कसौटी पे हृदय के कलाम को,
तब जाके चार शब्द कहीं बोलते हैं हम।
प्रेषक: अभिनव @ 11/16/2006 6 प्रतिक्रियाएं
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कोई दरवाज़े पे देता नहीं दस्तक प्यारे,
अब कहाँ पाते हैं दिल खोल के हँस तक प्यारे,
ऐसा ईनाम मिला है ईमानदारी का,
एक कर्फ्यू है संभाले मेरा मस्तक प्यारे,
जब से आए हैं सफर इंतज़ार करता है,
कोई भी छोड़ने आएगा ना बस तक प्यारे,
कैसे बतलाएँ तुम्हें एक तुम्हारे जाने से,
मेरे भीतर कोई धरती गई धंस तक प्यारे,
पहले ये खून खौलता था कुछ सवालों पर,
अब फड़कती ही नहीं एक भी नस तक प्यारे।
प्रेषक: अभिनव @ 5/14/2006 4 प्रतिक्रियाएं
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हमने अपना भेष बदल कर देख लिया,
सच्चाई की राह पे चल कर देख लिया,
भाई नें भाई को गोली मारी है,
अपना घर चुपचाप संभल कर देख लिया,
अच्छी खासी कनफ्यूज़िंग सामग्री है,
सभी धर्म ग्रन्थों को पढ़ कर देख लिया,
रात और दिन को कैसे जुदा करें बोलो,
हमने फिर सपने में दफ्तर देख लिया,
लगता है माडर्न आर्ट सा जीवन है,
दुनिया के नक्शे पर कढ़ कर देख लिया,
'अभिनव' अनुबंधों के नव संबंधों में,
झूठी मुस्कानों को भर कर देख लिया।
प्रेषक: अभिनव @ 4/26/2006 4 प्रतिक्रियाएं
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मन में जो आ रहा है, आप भी सुनिए;
पथरीले चेहरों पर मुस्कानों का खिलना,
जीवन की उलझन का अच्छा भुलावा है,
हिंदी अंग्रेज़ी में कौन बात करता है,
बहती तरंगों की भाषा तो जावा है,
ऐसे में अनुभूति नव चाहे अभिनव हो,
पुस्तक का छपना तो मात्र एक छलावा है,
जिन कोमल पंखों को बिखराया आंधी नें,
उन बिखरे पंखों से उड़ने का दावा है।
प्रेषक: अभिनव @ 4/01/2006 1 प्रतिक्रियाएं
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नमस्कार मित्रों,
इधर काफी समय से कलम चलने से मना कर रही है, उँगलियाँ कीबोर्ड तक आकर रुक सी जा रही हैं। मन कह रहा है कि लिखने का कुछ उद्देश्य होना आवश्यक है। मित्र भारतभूषण कहते हैं कि अच्छे शब्दों में मीठे भावों को पिरो कर एक अच्छी कलाकृति तो बन सकती है पर वह साहित्य नहीं है, कविता नहीं है। इस परिपेक्ष में आस पास जो दिख रहा है सो लिख रहा हूँ। जगह जगह गज़ल के नियमों का उल्लंघन हुआ है, साधना में कमी के कारण। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा।
ऊपर ऊपर से दुनिया को हंसता देख रहा हूँ मैं,
नित्य गले में कोई फन्दा कसता देख रहा हूँ मैं,
जैसे कोई नाव भँवर में घिर घिर घिरती जाती है,
वैसे खुद को इस जीवन में फँसता देख रहा हूँ मैं,
अगर नया कुछ करना है तो जल्दी ही करना होगा,
बैठे बैठे जाने किसका रस्ता देख रहा हूँ मैं,
दो कौड़ी में इज्ज़त, चार में ईमाँ, छह में बाकी सब,
माल आज भी बाज़ारों में सास्ता देख रहा हूँ मैं,
जाने कैसी देखभाल करती हैं वो अपने घर में,
अब भी अपने दिल की हालत खस्ता देख रहा हूँ मैं,
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई गीत भले ही गाओ तुम,
नफरत की बस्ती को पल पल बसता देख रहा हूँ मैं,
लकड़ी से लकड़ी का नाता कितना गहरा होता है,
तेज़ कुल्हाड़ी का छोटा सा दस्ता देख रहा हूँ मैं,
वो सोने और चाँदी को अब प्लैटिनम् करते होंगे,
कैसे करते हैं हीरे को जस्ता देख रहा हूँ मैं,
मुरझाने वाले असली रंगों का दौर पुराना था,
नकली फूलों का 'अभिनव' गुलदस्ता देख रहा हूँ मैं.
प्रेषक: अभिनव @ 2/16/2006 5 प्रतिक्रियाएं
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