इधर सिएटल में खूब बरफ पड़ी है. सारा माहौल हिममय हो गया है. इसी पर कुछ तुकबंदी हुयी है; अपने इधर के मौसम, कुछ यूँ बदल रहे हैं, हिमपात हो रहा है, आलाव जल रहे हैं, बादल नें बिजलियों से अपनी कमर कसी है, सूरज के सातों घोड़े बच कर निकल रहे हैं, सड़कों पे चल रही है, दुनिया संभल संभल कर, ज़्यादा संभलने वाले, ज़्यादा फिसल रहे हैं, उजली सफ़ेद चादर, हर और बिछ गई है, पेडों की पत्तियों के, आंसू निकल रहे हैं, कमरे के हीटरों की औकात बढ़ गई है, चाय की प्यालियों के किस्से उबल रहे हैं, कल ये बरफ गलेगी, कल ये उगेगा सूरज, कल ठीक होगा सबकुछ, अरमान पल रहे हैं. _______________________ Abhinav Shukla 206-694-3353 P Please consider the environment. |
हिमपात हो रहा है - एक तुकबंदी
Dec 23, 2008प्रेषक: अभिनव @ 12/23/2008 5 प्रतिक्रियाएं
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अरुंधती पर लिखी कविता पर कविवर राकेश खंडेलवाल एवं भारतभूषण की प्रतिक्रियाएं
Dec 22, 2008अरुंधती पर लिखी कविता पर मुझे अनेक टिप्पणियां प्राप्त हुयीं. प्रिय मित्र भारतभूषण नें तथा कविवर राकेश खंडेलवाल जी नें अपनी टिप्पणियां व्यक्तिगत मेल द्वारा भेजीं. मुझे दोनों टिप्पणियां रोचक लगीं अतः उन्हें यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
राकेश जी नें कविता की निम्न पंक्ति को रेखांकित करते हुए अपने विचार व्यक्त किए हैं;
'अभी मेरे पास तुम्हारे सवालों का जवाब नहीं है'
आज तुम्हारे पास प्रश्न का उत्तर नहीं ? कहो कल था क्या,
आज नाम जो देते मुझको, क्या ये सब कल कहा नहीं था,
कहते हो तुम जानते सभी कुछ, तो क्यों महज भुलावा देते,
और आज यह पक्ष बताना, कल भी कहो नहीं था यह क्या,
भ्रांति तुम्हें है तुम सशक्त हो, भीरु मगर हो अंन्तर्मन में,
केवल बातें कर सकते हो, कब तलवार उठी है कर में,
बातों के तुम रहे सूरमा, चलो और कुछ भाषण दे लो,
लहरें नहीं उठा करती हैं, सूखे हुए कुंड के जल में.
- राकेश खंडेलवाल
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भारतभूषण नें अपने क्लासिक अंदाज़ में टांग खींचने का प्रयास किया है;
सुनो अभिनव
तुम मेरे दोस्त हो
हमने काफी समय साथ गुज़ारा है
और
कुछ मतभेदों के बावजूद
मैं तुम्हारी काव्य-प्रतिभा
का कायल हूँ
अरुंधती के बारे में
हमने कई बार बहस की है
उसके निष्कर्षों से सहमत न होना
नितांत स्वाभाविक है
मेनस्ट्रीम के कहकहों में
हाशिये का रोना भी क्या रोना
डैम और बम के विरोध का क्लासिफिकेशन=सेडिशन
आई एस आई की एजेन्सी
या डीलरशिप मिले बिना
मुंबई,गुजरात और कश्मीर का त्रिकोण
भला कौन खींचेगा
और पिट्ठू द्वारा पश्चिम के गढ़ में
स्तुति-सुमनों का वर्षाव भी क्या खूब!
बुकर पुरस्कार, लानन फाउंडेशन पुरस्कार
और पुस्तकों की रायल्टी से अर्जित
लगभग दो करोड़ रुपयों की राशि को
संगठनों, संस्थाओं, आन्दोलनों, व्यक्तिओं,नाट्य समूहों
यानी दीगर देशद्रोहियों , पश्चिम के पिट्ठूओं और एजेंटों
में बाँट देना
लालच की पराकाष्ठा है!
'आर्म-चेयर' साहित्य सृजन
के दौर में
एक्टिविस्ट-लेखक होना
सचमुच वल्गर है
और हाँ, अरुंधती की भाषा,
उसकी शैली
इन्सिडेन्टल है
जिसके प्रभाव से मुक्त होने में
तुम्हें ज्यादा देर नहीं लगेगी.
- भारतभूषण तिवारी
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और भी अनेक टिप्पणियां प्राप्त हुयी हैं कुछ में गुस्सा है तो कुछ में समर्थन. सभी का धन्यवाद् देते हुए मैं बस इतना कहना चाहूँगा की;
लिखा वही है जो कुछ मेरे इस मन नें महसूस किया है,
सीधी सरल बात बोली है कोई लाग लपेट नहीं है,
अपनी कमियों का अंदाजा है इस 'आर्म-चेयर' कवि को,
पर भावों के ऊपर रखा कोई पेपर वेट नहीं है.
प्रेषक: अभिनव @ 12/22/2008 3 प्रतिक्रियाएं
अरुंधती, तुम मुझे बुरी नहीं लगती हो
Dec 19, 2008सुनो अरुंधती, तुम मुझे बुरी नहीं लगती हो, बल्कि, एक समय तो मैं तुम्हारा फैन भी रहा हूँ, तुम्हारी भाषा, तुम्हारी शैली, तुम्हारे निबंध, उन निबंधों में प्रस्तुत तथ्य, उन तथ्यों में छिपा हुआ सत्य, उन सत्यों का विवेचन, निष्कर्षों तक पहुँचने का तुम्हारा तरीका, सब मुझे भाता है, पर क्या करुँ, मेरा मन तुम्हारे निष्कर्षों से मेल नहीं खाता है, मेरा विश्वास है, की आज नहीं तो कल, मैं नहीं तो कोई और, तुम्हारी ही भाषा में, तुम्हारी ही शैली में, उन्हीं तथ्यों, सत्यों और विवेचनों के साथ, तुम्हे उत्तर देगा, और तुम वो लिखने लगोगी, जो और अधिक सत्य हो, पर, अभी मेरे पास तुम्हारे सवालों का जवाब नहीं है, अतः, मैं तुमको देशद्रोही, पश्चिम का पिट्ठू, लालची, आई एस आई की एजेंट, और भी बहुत कुछ कह कर, अपनी भड़ास निकाल रहा हूँ, आशा है तुम स्वस्थ्य एवं प्रसन्न होगी, अपने सभी मित्रों से मेरा नमस्कार कहना, सुनो अरुंधती, तुम मुझे बुरी नहीं लगती हो. ______________________ Abhinav Shukla 206-694-3353 P Please consider the environment. |
प्रेषक: अभिनव @ 12/19/2008 12 प्रतिक्रियाएं
जूता ऑन बुश, दुनिया खुश - एक जूतात्मक लेख
Dec 17, 2008मगर चलो कोई बात नहीं,
गैंडे की खाल पे,
जूतों का असर क्या होगा.
Abhinav Shukla
206-694-3353
प्रेषक: अभिनव @ 12/17/2008 1 प्रतिक्रियाएं
रिश्तों का रीचार्ज
Dec 11, 2008सन्डे का दिन था,
पत्नी बोली अपना कमरा साफ़ करो तुम,
ऐसा लगता है मानो ये,
किसी कबाडी का कमरा हो,
या फिर मानो ग्रीन रूम हो,
किसी पुराने से थिएटर का,
मेरी चाचीजी कल घर आने वाली हैं,
उनके आगे कह देती हूँ,
सुन लो ये सब नहीं चलेगा,
गृह मंत्री का उद्बोधन सुन,
अलसाते से उठे,
किताबें ज़रा समेटीं,
कागज़ पत्तर हिला दुला कर,
इस कोने से उन्हें उठा कर,
उस कोने पर रखा और फिर,
उन पर एक सुंदर सा डिब्बा,
डिब्बे पर सुंदर सी चादर,
चादर पर गुलदान सुनहरा,
जिसमें नारंगी काग़ज़ के,
सुंदर सुंदर फूल लगाये,
ये कोना तो ठीक हो गया.
अलमारी क्या पूरी दुनिया बसी हुयी है,
तरह तरह की इसमें चीज़ें ठुंसी हुयी हैं,
चलूँ ज़रा इनको भी देखूं,
अभी, पाँच बरस पहले ही तो इस अलमारी को साफ़ किया था,
ये तो बहुत पुराना फ़ोन है मेरा,
आन करुँ और देखूं इसको,
मैंने दोनों फ़ोन उठाये,
एक हाथ में नया फ़ोन,
और एक हाथ में फ़ोन पुराना,
एक एक कर मैंने दोनों फोनों के सब नंबर देखे,
नए फ़ोन में जो नंबर हैं उनका मुझको अंदाजा है,
कुछ नंबर हैं उनके जिनसे काम पड़ा था,
कुछ नंबर हैं उनके जिनसे काम पड़ेगा,
कुछ नंबर तो बड़े ही नामी और गिरामी लोगों के हैं,
जिनका नंबर होने भर से फ़ोन की इज्ज़त बढ़ जाती है,
कुछ उन कवियों के नंबर हैं,
जिनको लगता है की मैं कोई आयोजक हूँ,
और हैं कुछ उन कवियों के,
जो मुझको आयोजक लगते हैं.
नंबर नंबर देख लिया है,
नंबर के इस सागर में केवल,
तीन चार नंबर ऐसे हैं,
जो दोनों ही फोनों में हैं,
एक मेरी पत्नी का नंबर,
एक है माता और पिता का,
एक मेरे छोटे भाई का,
फ़ोन न हो तो ये नंबर भी दूर ही रहते,
क्योंकि मुझको इनके नंबर याद नहीं हैं,
मुझको ऐसा लगता है की,
अब उनको भी,
मेरा नंबर याद नहीं है.
बहुत दोस्तों के नंबर थे,
दोस्त तो मेरे अपनों से ज़्यादा अपने थे,
दोस्त वो जिनके साथ कभी देखे सपने थे,
उनमें से तो एक भी नंबर,
नए फ़ोन के पास नहीं है,
शायद धीरे धीरे करके सबके नंबर बदल गए हों,
कुछ कुछ मैं भी बदल गया हूँ,
कुछ कुछ वो भी बदल गए हों.
सबसे सस्ता माडल,
मेरे पास अब आई फ़ोन है,
शायद कोई फ़ोन उधर से उठ ही जाए,
शायद कोई पहचाने और मुझे बताये,
उसके नए फ़ोन में मेरा नंबर है क्या,
उसने फ़ोन पुराना कभी टटोला है क्या,
उसने भी क्या रिश्तों को रीचार्ज किया है,
या उसने भी जीवन मेरी तरह जिया है.
Abhinav Shukla
206-694-3353
प्रेषक: अभिनव @ 12/11/2008 4 प्रतिक्रियाएं
एक स्वाभिमानी गीत - भला लिखूं बुरा लिखूं
Dec 10, 2008ये न सोचूं कि क्या लिखूं,
उजालों को लिखूं दहशत,
अंधेरों को ख़ुदा लिखूं,
बड़े कवियों की टोली में मेरा भी नाम हो जाए,
लगें कविताएँ मेरी सारी कोरस की किताबों में,
बहुत से पत्र आयें मेरी रचना के जवाबों में,
मुझे कविता सुनानी है बड़े से मंच पे चढ़ कर,
गले का हार लेना है ज़रा रुक कर ज़रा बढ़ कर,
रहूं शामिल प्रपंचों और शब्दों की कुटाई में,
मेरी तो जान अटकी है लिफाफे की मुटाई में,
यदि मुझको मिले दौलत तो मैं ये काम भी कर दूं,
करूं तेज़ाब शबनम को,
ज़हर को ही दवा लिखूं,
उजालों को लिखूं दहशत,
अंधेरों को ख़ुदा लिखूं,
शरद, परसाई का कूड़ा क्या देगा हौसला मुझको,
अमां कोहली को पढ़ कर क्या मुझे श्री राम बनना है,
पढूंगा सिर्फ़ वो जिससे की मेरा काम बनना है,
अगर ग़लती हो छंदों में तो चलती है नया युग है,
बहर टूटी भी गज़लों में मचलती है नया युग है,
मेरे गीतों को फिल्मों में जगह मिल जाए जल्दी से,
पुरुस्कारों की देवी भी इधर मुस्काय जल्दी से,
इशारा तो करें सम्मान कोई मुझको देने का,
लिखूं चालीसा नेताजी की,
थु थू को वाह वा लिखूं,
भला लिखूं बुरा लिखूं,
ये न सोचूं कि क्या लिखूं,
उजालों को लिखूं दहशत,
अंधेरों को ख़ुदा लिखूं.
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Abhinav Shukla
206-694-3353 | www.kaviabhinav.com
प्रेषक: अभिनव @ 12/10/2008 3 प्रतिक्रियाएं
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बहुत पानी बरसने से नदी में बाढ़ आती है
Dec 7, 2008बहुत पानी बरसने से नदी में बाढ़ आती है,
कोई बिटिया ज्यों अपने मायके को छोड़ जाती है,
घड़ी भी देखो, ले दे कर वही टाइम बताती है,
हमारे माथे पर अब तक ये मिट्टी जगमगाती है,
न जाने कौन सी भाषा में कोयल गीत गाती है.
Abhinav Shukla
206-694-3353
प्रेषक: अभिनव @ 12/07/2008 3 प्रतिक्रियाएं
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