सुनो अरुंधती, तुम मुझे बुरी नहीं लगती हो, बल्कि, एक समय तो मैं तुम्हारा फैन भी रहा हूँ, तुम्हारी भाषा, तुम्हारी शैली, तुम्हारे निबंध, उन निबंधों में प्रस्तुत तथ्य, उन तथ्यों में छिपा हुआ सत्य, उन सत्यों का विवेचन, निष्कर्षों तक पहुँचने का तुम्हारा तरीका, सब मुझे भाता है, पर क्या करुँ, मेरा मन तुम्हारे निष्कर्षों से मेल नहीं खाता है, मेरा विश्वास है, की आज नहीं तो कल, मैं नहीं तो कोई और, तुम्हारी ही भाषा में, तुम्हारी ही शैली में, उन्हीं तथ्यों, सत्यों और विवेचनों के साथ, तुम्हे उत्तर देगा, और तुम वो लिखने लगोगी, जो और अधिक सत्य हो, पर, अभी मेरे पास तुम्हारे सवालों का जवाब नहीं है, अतः, मैं तुमको देशद्रोही, पश्चिम का पिट्ठू, लालची, आई एस आई की एजेंट, और भी बहुत कुछ कह कर, अपनी भड़ास निकाल रहा हूँ, आशा है तुम स्वस्थ्य एवं प्रसन्न होगी, अपने सभी मित्रों से मेरा नमस्कार कहना, सुनो अरुंधती, तुम मुझे बुरी नहीं लगती हो. ______________________ Abhinav Shukla 206-694-3353 P Please consider the environment. |
कमाल तकियाकलाम का
15 hours ago



12 प्रतिक्रियाएं:
good Guru...
उम्दा अभिव्यक्ति
http://pyala.blogspot.com/2008/10/blog-post_6283.html
इस पोस्ट को अवश्य पढ़ें। अरुंधति की भूमिका पर मैंने अपने विचार व्यक्त किए हैं।
धन्यवाद।
सुनों अरुंधति ,तुम एक जड़ों से कटी ,बाल कटी ,बौद्धिक अपच की शिकार उद्दंड बाला हो !
तुममें लोकप्रियता पाने के वन्शाणु भी हैं और इस खातिर अपने संस्कृति संकारों को भी बलि देने की भी ललक है !!
इसके बावजूद भी तुम कुछ लोगों को ललचाती हो , प्रकृति की तुम पर उदारता है !
बढियां कविता !
उम्दा अभिव्यक्ति
मेरी नजर में देश की सबसे घटिया नारी
अभिनव आपने मेरी उस धारणा को पुष्ट कर दिया कि आम आदमी के विरोध में और एक कवि के विरोध करने तरीके में बड़ा फर्क होता है । आपने जो लिखा वो स्तंभित करने वाला है ।
और ये भी कि आपने जिस सौम्य भाषा का प्रयोग करके जितनी कटु बातें कह दी हैं वो केवल एक कवि के लिये ही संभव है । तभी तो रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि हर युग अपने कवि की पतिक्षा करता है
भावों शब्दों और लिखने के अंदाज पर ..निसार ..शुभ-शुभ
बहुत गजब कविता। हम इतनी बढ़िया तरीके से अरुंधती जी के बारे में न लिख पाते।
Gazab Dhaa diya Srimaan ji..kya kha diya hai...cubnai wala vayag hai.
अच्छा लगा....
इतनी प्यारी आंटी को सच्ची बात नही कहते अंकल ,बुरा मान जायेगी
कोई इस तिलमिलाती कविता को अरुंधति आंटी को तो फारवर्ड करो यार...
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