अलार्म बज बज कर,
सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है,
बाहर बर्फ बरस रही है,
दो मार्ग हैं,
या तो मुँह ढक कर सो जाएँ,
या फिर उठें,
गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ।
'सावन का महीना' - "होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर"
इधर हमको भगवान् श्री कृष्ण की नगरी वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बांके बिहारी जी के मन्दिर के बाहर कुछ भजन पुस्तिकाएं प्राप्त हुयीं. उनमें मेरे प्रिय गीत 'सावन का महीना' की तर्ज पर एक भजन भी मिला. वैसे तो फिल्मी गीतों की तर्ज़ पर भजनों में भक्ति भाव का आभाव और प्रदर्शन का आधिक्य होता है, पर ये अच्छा लगा.
'ये कविराज न जाने अपने आप को क्या समझता है, कविता एक भी नही है, बस लाफ्फज़ी कर लो, ऊट पटांग घिसे पिटे चुटकुले, *&%^^ *&^&* ^%$%^$%^ &^%&^%'
'ठीक कहते हैं और ये *&^*&$* राधेश्याम भी उसके जाल में फँस गया है, सुनते हैं की इस होली पर पूरा टूर बना रहे हैं, बस इनके लोग ही जायेंगे.'
'इनके लोग सब फ्राड हैं, &^%&^%&(%^, मेरा तो खून खौल उठता है, तुमने देखा कैसे साजिश कर के मुझे नीचा दिखाते हुए बुलाया, बस जो अपनी जी हुज़ूरी करे उसको जमाओ बाकी को उखाड़ दो, मैं देखता हूँ की अब मेरे कार्यक्रमों में ये कैसे आता है,'
'वैसे एक और बात बताएं, इन लोगों का जाल इधर बाहर भी फ़ैल रहा है, कम्पूटर पर भी बड़ी मार्केटिंग हो रही है, चोर कहीं के, ख़ुद से एक कविता तो लिखी नहीं जाती और हरकतें, मुर्गा, शराब, और भी न जाने क्या क्या, &^%&^%&(^%^& हवाई जहाज से आते जाते हैं, हुंह *^&*^&)*^&^%.'
(कविराज का प्रवेश...)
'आइये कविराज आइये, चरणों में प्रणाम स्वीकारिये, अभी अभी आप ही की प्रशंसा ही रही थी,'
'वाह भाई ये हुई न बात, इधर मैं भी राधेश्याम जी से आपकी स्तुति कर के आ रहा हूँ.'
'आज तो आपको सुनकर बहुत बढ़िया लगा, क्या अंदाज़ है आपका, सुन रहे हैं इधर टूर लग रहा है, भूल मत जाइयेगा अपने इस भक्त को.'
'अरे कैसी बात करते हैं, आप तो हमारे भाई हैं, आपको कहाँ भूल कर जायेंगे, वैसे टूर तो राधेश्याम करवा रहे हैं उनसे भी बात कर लीजियेगा.'
(...कुछ देर तक सन्नाटा, अब कोई बोले भी तो क्या. तभी राधेश्याम जी मंच से संचालन करते हुए कहते हैं,)
'माँ वीणावादिनी के चरणों में प्रणाम करते हुए, अब हम कवि सम्मेलन के दूसरे सत्र का प्रारम्भ करते हैं, माँ शारदा के सभी वरद पुत्रों से अनुरोध है की एक बार पुनः, मंच की शोभा बढ़ाने के लिए यहाँ आ जाएँ.'
मित्रों इधर एक युवा कवि की कवितायेँ सुनने का अवसर मिला. कवि सौरभ सुमन मेरठ में रहते हैं और वीर रस की रचनायें मंच पर पढ़ते हैं. इधर उनकी कविता 'वंदे मातरम' यू ट्यूब पर सुनने को मिली. उस कविता को आप इस पोस्ट के साथ लगे विडियो में सुन सकते हैं.
ये रहे कविता के शब्द,
मजहबी कागजो पे नया शोध देखिये। वन्दे मातरम का होता विरोध देखिये। देखिये जरा ये नई भाषाओ का व्याकरण। भारती के अपने ही बेटो का ये आचरण। वन्दे-मातरम नाही विषय है विवाद का। मजहबी द्वेष का न ओछे उन्माद का। वन्दे-मातरम पे ये कैसा प्रश्न-चिन्ह है। माँ को मान देने मे औलाद कैसे खिन्न है। मात भारती की वंदना है वन्दे-मातरम। बंकिम का स्वप्न कल्पना है वन्दे-मातरम। वन्दे-मातरम एक जलती मशाल है। सारे देश के ही स्वभीमान का सवाल है। आवाहन मंत्र है ये काल के कराल का। आइना है क्रांतिकारी लहरों के उछाल का। वन्दे-मातरम उठा आजादी के साज से। इसीलिए बडा है ये पूजा से नमाज से। भारत की आन-बान-शान वन्दे-मातरम। शहीदों के रक्त की जुबान वन्दे-मातरम। वन्दे-मातरम शोर्य गाथा है भगत की। मात भारती पे मिटने वाली शपथ की। अल्फ्रेड बाग़ की वो खूनी होली देखिये। शेखर के तन पे चली जो गोली देखिये। चीख-चीख रक्त की वो बूंदे हैं पुकारती। वन्दे-मातरम है मा भारती की आरती। वन्दे-मातरम के जो गाने के विरुद्ध हैं। पैदा होने वाली ऐसी नसले अशुद्ध हैं। आबरू वतन की जो आंकते हैं ख़ाक की। कैसे मान लें के वो हैं पीढ़ी अशफाक की। गीता ओ कुरान से न उनको है वास्ता। सत्ता के शिखर का वो गढ़ते हैं रास्ता। हिन्दू धर्म के ना अनुयायी इस्लाम के। बन सके हितैषी वो रहीम के ना राम के। गैरत हुज़ूर कही जाके सो गई है क्या। सत्ता मा की वंदना से बड़ी हो गई है क्या। देश ताज मजहबो के जो वशीभूत हैं। अपराधी हैं वो लोग ओछे हैं कपूत हैं। माथे पे लगा के मा के चरणों की ख़ाक जी। चढ़ गए हैं फंसियो पे लाखो अशफाक जी। वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है। वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है।
इस आशा के साथ की आने वाले समय में उनसे अनेक सार्थक विषयों पर बढ़िया कवितायेँ सुनने को मिलेंगी सौरभ को अनेक शुभकामनाएं.
नोट: १. कवि सौरभ सुमन का ब्लॉग यहाँ क्लिक कर के देखा जा सकता है. २. मुझसे वीर रस के कवियों में, डा हरि ओम पंवार और डा वागीश दिनकर की कवितायेँ विशेष रूप से अच्छी लगती हैं. कमाल की बात है की दोनों मेरठ के ही आस पास के रहने वाले हैं. ऐसा लगता है की मेरठ की भूमि वीर रस के कवियों के लिए काफ़ी उर्वरक है. मेरा जन्म भी मेरठ में हुआ है अतः लगता है की अब कलम को कुछ वीर रस की उत्साहपूर्ण रचनाओं को लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए.
इधर कुछ दिनों पहले गीत सम्राट श्री राकेश खंडेलवाल हमारे अनुरोध पर सिएटल पधारे थे. उनके सम्मान में सिएटल में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया था. उनकी यात्रा को एक चित्रावली के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास नीचे किया है. आप चाहें तो आप भी सिएटल भ्रमण का आनंद इन चित्रों के मध्यम से उठा सकते हैं.
'हे भगवान्, ये लो गई भैंस पानी में, अब आई आई टी और आई आई एम् में भी आरक्षण होगा.'
'हाँ, तो क्या, वहां पहले से ही आरक्षण है, केवल जो पढ़ लिख पाता है उसी को प्रवेश मिलता है, और एस सी, एस टी भी है.'
'वो भी ग़लत है, पढ़ाई में कैसा आरक्षण, और अगर देना भी है तो आर्थिक आधार होना चाहिए, जाति के आधार पर आरक्षण, राम राम, एक तरफ़ तो दावा की सब समान हैं और दूसरी ओर ये सब.'
'भारत को जानते भी हैं आप, लोहिया को पढिये जाकर, बैठ कर बातें बनाते हैं.'
'क्यों लोहिया को पढ़ लूंगा, तो क्या कॉल सेंटर वाले मेरे लड़के को नौकरी दे देंगे, फालतू बात करते हैं, अच्छा ये बताइए की अभी ही कितने आरक्षण वाले पास होकर निकल रहे हैं इनसे, ब्रांड इंडिया की ऐसी तैसी हो जायेगी, ये मुद्दा अबकी चुनाव में उठेगा ज़रूर, तब देखेंगे की आप क्या दलील देते हैं.'
'चुनाव में उठायेंगे, हा हा हा हा आपको टिकट कौन पार्टी देने जा रही है, मैडमजी, अटलजी, लालूजी या बहनजी, भाई हमारे देस में जो पिछडे हैं दलित हैं जनजाति वर्ग है, सबको आगे बढ़ने का बराबर हक मिलना चाहिए, ये नही की सब सवर्ण ही कुंडली मार कर बैठ गए.'
'ठीक है ठीक है, अब आपसे बहस में थोड़े ही न जीतेंगे, अच्छा छोडिये अपना एक लड़का कल इंटरव्यू दे रहा है, आप ही के कालेज में, ज़रा देख लीजियेगा.'
'क्या नाम है, कायस्थ है न.'
इस प्रकार एक बार फिर हमारे देश का एक ज्वलंत मुद्दा अपनी परिणति तक, पहुँचता पहुँचता रह गया.
इधर हमको दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में जाने का अवसर प्राप्त हुआ. वहां हिंद युग्म के मित्रों से मिलने का सुअवसर मिला. हमने 'पहला सुर' खरीदा तथा अपने ऍम पी ३ रिकॉर्डर में उनमें से कुछ महानुभावों के साक्षात्कार भी रेकॉर्ड कर लिए. हम तो औरों के भी करना चाहते थे पर दुकान बंद करने का समय हो चुका था और सुरक्षा विभाग के लोग अपनी सीटी बजाते हुए, डंडा फटकारते हुए 'हिंद युग्म' के स्टाल पर धरना प्रदर्शन करने लगे थे. आवाज़ कुछ बहुत बढ़िया नहीं आई है, कुछ रिकॉर्डर की कमी के कारण और कुछ मेरी अल्पज्ञता के कारण. अतः जो भी जैसा रेकॉर्ड हो सका है उसको आप तक अपने ब्लॉग द्वारा पहुँचने का प्रयास कर रहा हूँ. ये साक्षात्कार तथा कवितायेँ रेडियो सलाम नमस्ते के कवितांजलि कार्यक्रम में प्रसारित हो चुके हैं तथा इनको काफ़ी पसंद भी किया गया है.
पहली प्रस्तुति में आप रंजना रंजू जी, निखिल आनंद गिरी जी, सुनीता चोटिया जी, मनीष वंदेमातरम जी तथा शैलेश जी की कवितायेँ सुन सकते हैं.
और इस दूसरी प्रस्तुति में सुनते हैं की शैलेश भारतवासी जी अपने बारे में क्या क्या रहस्य की बातें बता रहे हैं.
पुस्तक मेले में सब लोगों से मिलना एक बड़ा अच्छा अनुभव रहा. बड़ी दूर तक स्मृतियों में अंकित रहेगा.