छंद

Dec 23, 2012


शाख से परिंदे नें ये कह के उड़ान भरी,
देखो अब हमारा इंतज़ार नहीं करना,
चीख चीख युद्ध नें सुनाया युद्धभूमियों को,
फेंको अस्त्र-शस्त्र कभी वार नहीं करना,
घन घन घनन लगाई मेघ नें गुहार,
कभी भी हमारा ऐतबार नहीं करना,
अंखियों के मोती यह बोल के दुलक गए,
कुछ भी करो दुबारा प्यार नहीं करना.

सभ्यता का आवरण ओढ़े हुए आचरण,
बिखर बिखर चूक चूक रह जाते हैं,
धुंधलाता लक्ष्य देख कांपते धनुर्धर,
धरे के धरे सभी अचूक रह जाते हैं,
शब्द अर्थ भाव सुर गीत लय ताल सब,
मन में जगाते एक हूक रह जाते हैं,
कूकती है प्रेम वाली कोकिला जो अम्बुआ पे,
ज्ञान के पपीहे सब मूक रह जाते हैं.

करूँ क्या दान...

Dec 22, 2012


करूँ क्या दान ज़िंदगी, बचा क्या मेरे पास है,
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.

न कोई गीत प्रेम का अधर पे मेरे आ सका,
न कोई राग भैरवी कभी स्वरों को पा सका,
मगर मिलाप हो गया नयन से नभ की ताल का,
पड़ाव बन गया समय समय की तेज़ चल का,
कुछ ऐसी रोशनी हुयी मैं रोशनी में खो गया,
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.

निशा चरण चरण कटी मगर न मोक्ष पा सकी,
सपन थे द्वार पर खड़े न नींद किंतु आ सकी,
बहुत अधिक थकान थी शरीर खंड खंड था,
नयन को अपने तेज़ पर घमंड ही घमंड था,
जो पुण्य गोद मिल गई मैं गहरी नींद सो गया,
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.

सभी कलुष भसम हुए कुछ इस तरह का होम था,
न कोई भेदभाव था प्रसन्न रोम रोम था,
उलझ सकी न ज़िंदगी किसी भी जात पात में,
फँसी न साँस फिर कभी कहीं किसी प्रपात में,
नए जनम की खोज में मैं उसके पास जो गया.
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.

न दृश्य दिख सका कोई नयन नयन बहक गए,
वो मेरे द्वार आ गई चमन चमन महक गए,
पवन का वेग थम गया गगन की धूप ढल गई,
वो दामिनी सी हंस पड़ी शिला शिला मचल गई,
बरस उठा कुछ इस तरह वो मेघ पाप धो गया,
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.

करूँ क्या दान ज़िंदगी, बचा क्या मेरे पास है,
किसी को प्राण दे दिये, ह्रदय किसी का हो गया.



पतझड़ का मौसम भी कितना रंग बिरंगा है

Dec 10, 2012

सियैटल में पतझड़ का अपना अलग ही रंग होता है. हलकी हलकी बारिश निरंतर चलती रहती है, आसमान पर मटमैले बादल छाये रहते हैं आर धरती पर असंख्य पत्र. 


लाल, हरे, पीले, नारंगी, भूरे, काले हैं,
पत्र वृक्ष से अब अनुमतियाँ लेने वाले हैं,
मधुर सुवासित पवन का झोंका मस्त मलंगा है,
पतझड़ का मौसम भी कितना रंग बिरंगा है.

जैसे दुल्हन कोई सासुरे अपने जाती हो,
पाँव महावर सजा हो, बिंदिया गीत सुनाती हो,
अक्षत, रोली, चन्दन, हल्दी संग विदाई हो,
चार कहारों नें डोली कांधों पे उठाई हो,
ऐसी सजधज, देख जिसे सजधज को विस्मय हो,
मन के भीतर भीतर कुछ अंजाना सा भय हो,
लाज-शर्म, मुस्कान, कंपकंपी, ताल अभंगा है,
पतझड़ का मौसम भी कितना रंग बिरंगा है.

स्वर्ग धरा पर उतरा ऋतुओं की अंगड़ाई है,
जीवन का यह चक्र अनोखा, मिलन जुदाई है,
मौन खड़े हैं वृक्ष बांह फैलाए बाबुल से,
बोल नहीं पाते हैं पर लगते हैं आकुल से,
चिड़िया तिनकों के घर से बाहर आ बैठी है,
सुनो ध्यान से, गीत विदा के गाती रहती है,
अम्बर से भी बरस रही आशीष की गंगा है, 
पतझड़ का मौसम भी कितना रंग बिरंगा है.


मन मंदिर में झंकार रहे

Nov 22, 2012

हंसवाहिनी के हंस मोती चुनें, मोतियों की सदा भरमार रहे,
वीणापाणी की वीणा बजे रागिनी, मन मंदिर में झंकार रहे,
ज्ञानदायिनी, ज्ञान भले ही न दे, भक्ति और प्रेम की रसधार रहे,
तेरे चरणों में शीश नवाता रहूँ, माता तेरा सदा उपकार रहे।

पुत्र, बधाई देता हूँ मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मदिवस पर

वैसे तो अथर्व का जन्मदिन 22 तारीख को होता है, पर इस वर्ष भारत में होने के कारण ये तिथि यहाँ से पहले ही आ रही है। 

तुम्हें गोद में लेकर लगता है मैं भी परिपूर्ण हुआ,
पुत्र, बधाई देता हूँ मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मदिवस पर।

तुमने जीवन में आकर जीवन का अर्थ बताया है,
सुप्त मातृ भावों को जागृत कर उनको सहलाया है,
बाबा दादी के चेहरे की मुस्कानों में सजे रहो,
चाचा चाची के आशीषों की मिठास में पगे रहो,
माता हेतु रहो सदा तुम नई पूर्णता के द्योतक,
भगिनी हेतु सदा एक नटखट से भाई बने रहो,
पुत्र, बधाई देता हूँ मैं तुम्हें तुम्हारे जन्मदिवस पर।


चांदनी और सिहा गयी होगी

Nov 2, 2012

सोच रहा हूँ की जब श्रीमतीजी चन्द्र देव की पूजा करने गयी होंगी तो कैसा माहौल रहा होगा. विवाह के बाद यह दूसरी बार है जब हम लोग साथ नहीं हैं.

थाल के दीप की बाती भी नेह की बारिश भीग नहा गयी होगी,
साथ मिले सिर्फ जन्म क्यों सात ये बात विधि को बता गयी होगी,
प्रेम के मूल में त्याग छिपा यह आखर ढाई पढ़ा गयी होगी,
चाँद नें चाँद को देखा जो होगा तो चांदनी और सिहा गयी होगी.

विजयदशमी की अनंत शुभकामनाएं.

Oct 24, 2012




दस सिर वाला रावण मारो,

मेघनाद को भी संहारो,
कुम्भकरण की छाती पर चढ़,
विजय पताका अपनी गाड़ो,
पर जीवन की चमक दमक में,
आँख मूँद कर झूल न जाना,
मन में जो रावण बैठा है, 
उसको प्यारे भूल न जाना. 

मन का रावण महा ढीठ है,
अपने मन की करता है,
कोई अंकुश नहीं मानता,
राम से भी न डरता है,
धीरे धीरे लंका नगरी,
का विस्तार बढाता है,
और अयोध्या तक आकर,
अपना अधिकार जताता है,
स्वर्ण मृगों की धमाचौकड़ी,
आपहरण का कारण है,
जो आराध्य हैं अपने उनका,
जीवन एक उदाहरण है,
तुलसी बाबा लिख गए मानस,
अमल अचल मन त्रोन समाना,
जिसका शब्द शब्द अमृत है,
उसको प्यारे भूल न जाना.








विजयदशमी की अनंत शुभकामनाएं.
जय श्री राम! जय जय श्री राम!