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कवि सम्मेलन सूचना - ३१ मई सायं ७:३० बजे - मिलीपिटास, कैलिफोर्निया (फ्रीमोंट के निकट)
May 31, 2008प्रेषक: अभिनव @ 5/31/2008 1 प्रतिक्रियाएं
मेरे नगर में आज कल पानी बरसता है बहुत
May 8, 2008मेरे नगर में आज कल पानी बरसता है बहुत,
सदियों पुराना पेड़ पर प्यासा तरसता है बहुत,
रोने की आवाजें मेरे कानों में फिर आने लगीं,
नेपाल नंदीग्राम में कोई तो हँसता है बहुत,
बहने दे थोडी साँस भी महंगाई के ओ देवता,
तू तो गले में डाल कर फंदे को कसता है बहुत,
नफरत के सिर पर बैठने का राजशाही पैंतरा,
कर तो रहा है काम पर ये नाग डसता है बहुत.
प्रेषक: अभिनव @ 5/08/2008 10 प्रतिक्रियाएं
Labels: गीतिका
'सावन का महीना' - "होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर"
Apr 17, 2008
इधर हमको भगवान् श्री कृष्ण की नगरी वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बांके बिहारी जी के मन्दिर के बाहर कुछ भजन पुस्तिकाएं प्राप्त हुयीं. उनमें मेरे प्रिय गीत 'सावन का महीना' की तर्ज पर एक भजन भी मिला. वैसे तो फिल्मी गीतों की तर्ज़ पर भजनों में भक्ति भाव का आभाव और प्रदर्शन का आधिक्य होता है, पर ये अच्छा लगा.
मूल गीत आप यहाँ पढ़ सकते हैं.
ये रहा वो भजन,
फागुन का महीना केसरिया रंग घोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर,
ओढ़ के आई कान्हा नई रे चुन्दरिया,
भर पिचकारी मोहे मारो न सांवरिया,
भर पिचकारी मारी कर दीन्हीं सरवोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर,
उड़त गुलाल श्याम लाल भये बदरा,
राधा की आंखन को बिगडो है कजरा,
ननद देय मोय तानो घर सास करे शोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर.
इसको मूल गीत की तर्ज पर गा कर देखिये..
पुस्तक में इसके रचयिता का नाम नही है, ये लिखा है की "आभार उन सभी भक्तों का जिनके लिखे गीत इसमें शामिल किए गए हैं." अतः हमारी और से भी आभार.
चित्र सौजन्य: ISKCON
प्रेषक: अभिनव @ 4/17/2008 2 प्रतिक्रियाएं
निंदा के दम पर जिंदा
Apr 14, 2008'ये कविराज न जाने अपने आप को क्या समझता है,
कविता एक भी नही है, बस लाफ्फज़ी कर लो,
ऊट पटांग घिसे पिटे चुटकुले,
*&%^^ *&^&* ^%$%^$%^ &^%&^%'
'ठीक कहते हैं और ये *&^*&$* राधेश्याम भी उसके जाल में फँस गया है,
सुनते हैं की इस होली पर पूरा टूर बना रहे हैं,
बस इनके लोग ही जायेंगे.'
'इनके लोग सब फ्राड हैं,
&^%&^%&(%^,
मेरा तो खून खौल उठता है,
तुमने देखा कैसे साजिश कर के मुझे नीचा दिखाते हुए बुलाया,
बस जो अपनी जी हुज़ूरी करे उसको जमाओ बाकी को उखाड़ दो,
मैं देखता हूँ की अब मेरे कार्यक्रमों में ये कैसे आता है,'
'वैसे एक और बात बताएं, इन लोगों का जाल इधर बाहर भी फ़ैल रहा है,
कम्पूटर पर भी बड़ी मार्केटिंग हो रही है,
चोर कहीं के, ख़ुद से एक कविता तो लिखी नहीं जाती और हरकतें,
मुर्गा, शराब, और भी न जाने क्या क्या,
&^%&^%&(^%^& हवाई जहाज से आते जाते हैं,
हुंह *^&*^&)*^&^%.'
(कविराज का प्रवेश...)
'आइये कविराज आइये,
चरणों में प्रणाम स्वीकारिये,
अभी अभी आप ही की प्रशंसा ही रही थी,'
'वाह भाई ये हुई न बात,
इधर मैं भी राधेश्याम जी से आपकी स्तुति कर के आ रहा हूँ.'
'आज तो आपको सुनकर बहुत बढ़िया लगा, क्या अंदाज़ है आपका,
सुन रहे हैं इधर टूर लग रहा है,
भूल मत जाइयेगा अपने इस भक्त को.'
'अरे कैसी बात करते हैं, आप तो हमारे भाई हैं,
आपको कहाँ भूल कर जायेंगे,
वैसे टूर तो राधेश्याम करवा रहे हैं उनसे भी बात कर लीजियेगा.'
(...कुछ देर तक सन्नाटा, अब कोई बोले भी तो क्या. तभी राधेश्याम जी मंच से संचालन करते हुए कहते हैं,)
'माँ वीणावादिनी के चरणों में प्रणाम करते हुए,
अब हम कवि सम्मेलन के दूसरे सत्र का प्रारम्भ करते हैं,
माँ शारदा के सभी वरद पुत्रों से अनुरोध है की एक बार पुनः,
मंच की शोभा बढ़ाने के लिए यहाँ आ जाएँ.'
और मंच की शोभा बढ़ा दी जाती है.
प्रेषक: अभिनव @ 4/14/2008 2 प्रतिक्रियाएं
वंदे मातरम कविता - युवा कवि सौरभ सुमन
Apr 13, 2008मित्रों इधर एक युवा कवि की कवितायेँ सुनने का अवसर मिला. कवि सौरभ सुमन मेरठ में रहते हैं और वीर रस की रचनायें मंच पर पढ़ते हैं. इधर उनकी कविता 'वंदे मातरम' यू ट्यूब पर सुनने को मिली. उस कविता को आप इस पोस्ट के साथ लगे विडियो में सुन सकते हैं.
ये रहे कविता के शब्द,
मजहबी कागजो पे नया शोध देखिये।
वन्दे मातरम का होता विरोध देखिये।
देखिये जरा ये नई भाषाओ का व्याकरण।
भारती के अपने ही बेटो का ये आचरण।
वन्दे-मातरम नाही विषय है विवाद का।
मजहबी द्वेष का न ओछे उन्माद का।
वन्दे-मातरम पे ये कैसा प्रश्न-चिन्ह है।
माँ को मान देने मे औलाद कैसे खिन्न है।
मात भारती की वंदना है वन्दे-मातरम।
बंकिम का स्वप्न कल्पना है वन्दे-मातरम।
वन्दे-मातरम एक जलती मशाल है।
सारे देश के ही स्वभीमान का सवाल है।
आवाहन मंत्र है ये काल के कराल का।
आइना है क्रांतिकारी लहरों के उछाल का।
वन्दे-मातरम उठा आजादी के साज से।
इसीलिए बडा है ये पूजा से नमाज से।
भारत की आन-बान-शान वन्दे-मातरम।
शहीदों के रक्त की जुबान वन्दे-मातरम।
वन्दे-मातरम शोर्य गाथा है भगत की।
मात भारती पे मिटने वाली शपथ की।
अल्फ्रेड बाग़ की वो खूनी होली देखिये।
शेखर के तन पे चली जो गोली देखिये।
चीख-चीख रक्त की वो बूंदे हैं पुकारती।
वन्दे-मातरम है मा भारती की आरती।
वन्दे-मातरम के जो गाने के विरुद्ध हैं।
पैदा होने वाली ऐसी नसले अशुद्ध हैं।
आबरू वतन की जो आंकते हैं ख़ाक की।
कैसे मान लें के वो हैं पीढ़ी अशफाक की।
गीता ओ कुरान से न उनको है वास्ता।
सत्ता के शिखर का वो गढ़ते हैं रास्ता।
हिन्दू धर्म के ना अनुयायी इस्लाम के।
बन सके हितैषी वो रहीम के ना राम के।
गैरत हुज़ूर कही जाके सो गई है क्या।
सत्ता मा की वंदना से बड़ी हो गई है क्या।
देश ताज मजहबो के जो वशीभूत हैं।
अपराधी हैं वो लोग ओछे हैं कपूत हैं।
माथे पे लगा के मा के चरणों की ख़ाक जी।
चढ़ गए हैं फंसियो पे लाखो अशफाक जी।
वन्दे-मातरम कुर्बानियो का ज्वार है।
वन्दे-मातरम जो ना गए वो गद्दार है।
इस आशा के साथ की आने वाले समय में उनसे अनेक सार्थक विषयों पर बढ़िया कवितायेँ सुनने को मिलेंगी सौरभ को अनेक शुभकामनाएं.
नोट:
१. कवि सौरभ सुमन का ब्लॉग यहाँ क्लिक कर के देखा जा सकता है.
२. मुझसे वीर रस के कवियों में, डा हरि ओम पंवार और डा वागीश दिनकर की कवितायेँ विशेष रूप से अच्छी लगती हैं. कमाल की बात है की दोनों मेरठ के ही आस पास के रहने वाले हैं. ऐसा लगता है की मेरठ की भूमि वीर रस के कवियों के लिए काफ़ी उर्वरक है. मेरा जन्म भी मेरठ में हुआ है अतः लगता है की अब कलम को कुछ वीर रस की उत्साहपूर्ण रचनाओं को लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए.
प्रेषक: अभिनव @ 4/13/2008 1 प्रतिक्रियाएं
देखिये मज़ेदार चित्रावली और करिये सिएटल की यात्रा
Apr 12, 2008इधर कुछ दिनों पहले गीत सम्राट श्री राकेश खंडेलवाल हमारे अनुरोध पर सिएटल पधारे थे. उनके सम्मान में सिएटल में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया था. उनकी यात्रा को एक चित्रावली के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास नीचे किया है. आप चाहें तो आप भी सिएटल भ्रमण का आनंद इन चित्रों के मध्यम से उठा सकते हैं.
चित्रावली देखने हेतु यहाँ क्लिक करें.
ये बताइयेगा की चित्रों के नीचे लिखे हुए काप्श्न्स कैसे लगे और यदि इनको देखकर सिएटल घूमने का मन बने तो भी सूचित कीजियेगा :)
प्रेषक: अभिनव @ 4/12/2008 5 प्रतिक्रियाएं