घर में बेटी की किलकारियां,
घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे सुबह जगी नींद में स्वप्न कोई सुहाना पले,
जैसे दुःख का अंधेरा ढले, मंदिरों में दिया सा जले,
मंदिरों में दिया सा जले,
बज उठीं श्याम की मुरलियां,
घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे सागर की लहरों नें हो, तट के आंचल को आकर छुआ,
जैसे तारों भरी रात में, चांदनी नें पढ़ी हो दुआ,
चांदनी नें पढ़ी हो दुआ,
जैसे मोती भरी सीपियां,
घर में बेटी की किलकारियां.
जैसे भूले हुए गीत का, आ गया हो सिरा याद सा,
जैसे साहिर के शब्दों को पा, खिलता संगीत नौशाद का,
खिलता संगीत नौशाद का,
तितलियों की हैं अठखेलियां,
घर में बेटी की किलकारियां.
रेत के गाँव में जिस तरह, कोई नदिया कहानी कहे,
धुप को मुंह चिढ़ाती हुई, मंद शीतल पवन सी बहे,
मंद शीतल पवन सी बहे,
गीत, झूले, हरी डालियाँ,
घर में बेटी की किलकारियां.
जैस मीठे से संतूर पे, राग कोई मधुर सा बजे,
सात रंगों को संग में लिए, आसमां पे धनुष सा सजे,
आसमां पे धनुष सा सजे,
जैसे महकी सी फुलवारियां,
घर में बेटी की किलकारियां.
घर में बेटी की किलकारियां
Oct 2, 2011प्रेषक: अभिनव @ 10/02/2011 0 प्रतिक्रियाएं
Labels: गीत
सियैटल में झिलमिलाया, "झिलमिल २०११ - हास्य कवि सम्मेलन"
Sep 22, 2011
सितम्बर १७, २०११ सियैटल, संयुक्त राज्य अमेरिका. पिछले वर्ष सियैटल में हुए कवि सम्मेलन को मिली आशातीत सफलता को देखते हुए नगरी की सांस्कृतिक संस्था प्रतिध्वनि इस वर्ष पुनः हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया. हिंदी भाषा का जो स्वरुप कविताओं में उजागर होता है वह अत्यंत आनंद प्रदान करने वाला होता है. सधे हुए कवि सम्मेलनों में प्रस्तुतिकरण के कौशल द्वारा कविताओं की मिठास में चार चाँद लग जाते हैं. यदि बात हास्य कविताओं की हो रही हो तो फिर मिठास और आनंद का एक नाभकीय विस्फोट होता है. सियैटल नगरी में 'झिलमिल २०११ - हास्य कवि सम्मेलन' का आयोजन १७ सितम्बर २०११ को हुआ. सांस्कृतिक संस्था प्रतिध्वनि की ओर से प्रस्तुत इस कार्यक्रम में दो सौ श्रोताओं नें लगभग चार घंटे तक अनेक चटपटी और झिलमिलाती हुई हास्य कविताओं का रसास्वादन किया.
शहाना नें मां सरस्वती की वंदना कर कार्यक्रम को प्रारंभ किया. इस कवि सम्मेलन में सन फ्रांसिस्को से पधारी अर्चना पंडा, वैंकुवर कनाडा से आये आचार्य श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी तथा उनकी धर्म पत्नी कांति द्विवेदी. सियैटल नगरी से अंकुर गुप्त, निहित कौल, ज्योति राज, अनु अमलेकर, कृष्णन कोलाड़ी एवं अभिनव शुक्ल नें अपनी कविताओं का पाठ किया. कार्यक्रम का संचालन अभिनव शुक्ल नें किया. लगातार दूसरे वर्ष आयोजित 'झिलमिल' कवि सम्मेलन में श्रोताओं नें जम कर ठहाके लगाये और श्रेष्ठ कविताओं को भी सराहा. इस आशा के साथ की आने वाले वर्षों में हिंदी भाषा एवं कविताओं की झिलमिलाहट और भी अनेक चेहरों पर मुस्कराहट लेकर आएगी झिलमिल २०११ संपन्न हुआ.
इन्हें भी देखें (झिलमिल संबंधी महत्वपूर्ण कड़ियाँ)
1. कार्यक्रम के कुछ चित्र
2. अर्चना पंडा जी का झिलमिलाता हुआ झिलमिल संस्मरण
3. झिलमिल २०११ की वेबसाईट
प्रेषक: अभिनव @ 9/22/2011 3 प्रतिक्रियाएं
Labels: समाचार
पांच
Aug 18, 2011प्रेषक: अभिनव @ 8/18/2011 0 प्रतिक्रियाएं
युग धर्म - एक चेतना गीत
Jun 11, 2011एक योगाचार्य नें मशाल उठाई,
गाँव गाँव चेतना की ज्योति जगाई,
प्रेरणा दी देशवासियों को योग से,
मुक्त किया कितनों को कष्ट रोग से,
भ्रष्टता को जड़ से मिटाने के लिए,
लड़ा दूसरा स्वराज लाने के लिए,
लाठियां पड़ीं औ दगे हैं आंसू बम,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
घोटालों पे घोटालों का है अटूट क्रम,
टूट चुका गांधीजी का रामराजी भ्रम,
खीसें हैं निपोर रहे नेता बेशरम,
मालियों से कर रहा बगावत चमन,
गूंजने लगा है जयघोष से गगन,
मुट्ठियों को भींचे हुए देखेंगे न हम,
राष्ट्र चेतना में सराबोर जन जन,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
अपने कपट को छुपाने के लिए,
भारत को बेच बेच खाने के लिए,
काले धन में सदा नहाने के लिए,
खाता स्विस बैंक का बचने के लिए,
आन्दोलन दो कुचल ज़ोर से,
देश कहीं जाग नहीं जाए शोर से,
जो उठाये सिर उसे कर दो कलम.
मुट्ठियों को भींचे हुए देखेंगे न हम.
अ से आर्यव्रत की वे आन बान हैं,
न से न्यायशीलता का नव विधान हैं,
ना से नागरिकों की नयी पुकार हैं,
ह हमारी भारती के पुष्प हार हैं,
जा से जानदार हैं जुझारू वीर हैं,
रे से रेशमी उजालों के फ़कीर हैं,
अन्ना जी सिखाते हमें युग का धरम,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
देश भूल सकता न परशु राम को,
विश्वामित्र मांग ले गए थे राम को,
विश्व गुरु के दिए गीता के ज्ञान को,
या दधीचि के महान अस्थिदान को,
दुनिया जगाते गांधी के प्रबंध को,
चाणक्य नें पाठ पढाया जो नन्द को,
संत हैं सिखाते हमें जीने का चलन,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
बा से बाबाजी हमारे बेमिसाल हैं,
बा से बाहरी कुटिलता का काल हैं,
रा हमारे राष्ट्र की वे पहचान हैं,
म से मातृभूमि का मधुर गान हैं,
दे से देवताओं के वे समतुल्य हैं,
व विजयी, वरदानी हैं अतुल्य हैं,
इस युग के पतंजलि को नमन.
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
कालिमा नें उंगली उठाई धुप पे,
टिपण्णी की बाबाजी के नारी रूप पे,
सामने की दुष्टता का जो न हो चरम,
तो उठाने पड़ते हैं ऐसे भी कदम,
भस्मासुर नहीं यूँ ही मरा था,
भगवान नें भी नारी रूप धरा था,
भक्त नें किया है उसी का अनुकरण.
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
प्रेषक: अभिनव @ 6/11/2011 1 प्रतिक्रियाएं
Labels: कविताएं
करामात
Jun 5, 2011Abhinav Shukla
206-694-3353
प्रेषक: अभिनव @ 6/05/2011 2 प्रतिक्रियाएं
Labels: कविताएं
चार जून - हृदय का गान
Jun 3, 2011प्रेषक: अभिनव @ 6/03/2011 0 प्रतिक्रियाएं
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तेरे आने से बिटिया......
Apr 23, 2011मधुर मधुर गीतों में रस की फुहारें ज्यों,
ज़िन्दगी के कैनवस पे रंग प्यारे प्यारे ज्यों
सुबह की सैर में हों धूप के इशारे ज्यों,
सतरंगी चूनर पे टंके हों सितारे ज्यों,
तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है,
फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.
तू जन्मों से संचित किसी पुण्य के फल सी,
मन के मरुस्थल में बूँद बन के आई है,
जब तुझको देखा तो ऐसी अनुभूति हुयी,
जीवन में रुनझुन है गूंजी शहनाई है,
नवयुग की नव बेला राह देखती तेरी,
तू इसमें जीवन की परिभाषा बन जाना,
प्रकृति का तेज त्याग तप तुझमें वास करे,
तू दृढ संकल्पों की अभिलाषा बन जाना,
तेरा अस्तित्व रहे सदा सूर्य सा दीपित,
तेरा प्रवाह, बहें गंगा के धारे ज्यों,
तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है,
फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.
प्रेषक: अभिनव @ 4/23/2011 11 प्रतिक्रियाएं
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