अगर ये महाराज दुबला सकते हैं तो हम भी...

May 9, 2007


हाँ मित्रों, यह चित्र किसी ज़माने में हमारे आदर्श रहे, शैल-विशाल देहधारी, गजबदना, मोट-शिरोमणी, श्रीमान अदनान सामी का है। जब से हमें ज्ञात हुआ है कि इन्होंने भी अपना वज़न कम कर लिया है तब से हमें लगने लगा है कि संसार में कुछ भी असंभव नहीं है। यदि कल कोई हमसे आकर कहे कि मछलियाँ आसमान में उड़ने लगी हैं, शेर पेड़ पर रहने लगा है, नेता चरित्रवान हो गए हैं, पाकिस्तान आतंकवादियों को प्रशिक्षण नहीं दे रहा है, कशमीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है, यूपी में जुर्म कम है तथा अगला आलम्पिक सूरज पर हो रहा है तो अब मैं निर्विकार भाव से सब सच मानने को तैयार हूँ। जब ये दुबले हो सकते हैं तो कुछ भी हो सकता है, हम भी हो सकते हैं। बस आवश्यकता है सच्ची लगन और आत्मविश्वास की।

हर बार की तरह इस बार भी प्लान बना लिया गया है। बस अब आवश्कता है इस पर अमल करने की। तो प्लान है तीन तरफा आक्रमण का, हल्के फुल्के योग-व्यायाम, व्यवस्थित भोजन तथा प्रेरक काव्य तथा प्रसंगो द्वारा सफलता प्राप्त करने का।

शारीरिक व्यायामः
- सुबह नहा धो कर आधा घंटा योग करना है। प्राणायाम (भर्त्सिका, कपालभाती, बाह्य, अनुलोम-विलोम, भ्रामरी) तथा दो सूर्य नमस्कार (दाँए तथा बाँए)।
- शाम को आधा घंटा टहलना है। (ज़रा तेज़ चलना है ये नहीं कि आराम से सिलिर सिलिर।)

भोजनः
- चीनी, आलू तथा तली हुई चीज़ों का परहेज़ करना है।
- चावल पर अलग अलग मत प्राप्त हुए हैं अतः उसे अभी परहेज की परिधि से बाहर रखा गया है।
- पानी खूब पीना है तथा सुबह शाम एक एक ग्लास गुनगुना पानी भी पीना है।
- यदि संभव हो तो भोजन में सलाद (कच्ची गाजर, मूली, टमाटर इत्यादि) भी खाना है।

मस्तिष्कः
- स्वास्थ्यवर्धक साइट्स पर जाना है तथा अन्य लोग कैसे दुबलाए यह जानना है।
- उत्साह का संचार करने वाली कविताओं को पढ़ना है।

छह सप्ताह तक नियमित रूप से इस पर अमल करना है तथा प्रत्येक रविवार को वज़न नापना है। पहली नपाई इस रविवार को होगी।

वैसे तो ओवरवेट होने को व्यक्तिगत विषय माना जाता रहा है परंतु यदि आप चाहें तो आप भी इस प्लान पर अमल कर सकते हैं। जब मैं साप्ताहिक चार्ट प्रकाशित करूँगा तो आपके आंकड़े भी उसमें पेस्ट कर सकता हूँ।

नर हो न निराश करो मन को

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो

जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को

--राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त (साभारः कविता कोश)

योगा तथा प्राणायाम के कुछ वीडियोज़ नीचे दिए जा रहे हैं। (पहले ३० सेकण्डस ब्लैंक स्क्रीन आएगा)

प्राणायाम


योगासन

वज़न कैसे कम किया जाए

पिछले कुछ समय (कुछ वर्षों) से हमारे मन में ये विचार बार बार ठक ठक करता है कि भाई, तुम ओवरवेट हो तथा तुम्हारा वजन कम होना चाहिए। कभी कभी जोश-ए-जवानी में हफ्ता भर का डाइटिंग प्रोग्राम भी कर लेते हैं (पिछले चार साल में दो बार यह प्रोग्राम किया है)। दो चार किलो कम होता है पर जैसे ही नार्मल होते हैं फिर वापस आ जाता है। कभी कभार जिम, सुबह की कसरत, बाबा रामदेव का योगा तथा ईवनिंग वाक करते हैं पर वे भी नियमित नहीं हो पाते। कुल मिला कर हिसाब ये कि हमारे मन में काफी विचार करने तथा थोडा बहुत प्रयास करने के बाद भी वजन नें कुछ समय पहले सौ किलो की लक्ष्मण रेखा पार कर ली है। हमारे छोटे भाईसाहब आनंद को लगता है कि हमारा वेट बढ़ने का एक कारण हमारी कविता 'मुट्टम मंत्र' का नित्य पारायण है। उन्होंने हमें ये 'पतलम मंत्र' पढने की सलाह दी है, अपना तख़ल्लुस (हिचकी) भी रख लिया है।

'पतलम मंत्र'
छोड़ के आलस अब तुम भैया जल्दी जाओ जाग,
पहन कर री-बौक के जूते चार मील करो जौग,
चार मील करो जौग छोड़ दो आलू पूरी,
हलवाई की दुकान से बढ़ा लो घर की दूरी,

सुन लो मेरी बात को खड़े कर के कान,
मोटे भदभद नहीं जानते हैं पतलों की शान,
हैं पतलों की शान थे अपने गाँधी दुबले,
छोड़ो घी को खाओ खूब टमाटर उबले,

कुल मिलाकर बात ये मेरी जाओ मान,
हिरतिक बनो शान से भाई नहीं बनो अदनान,
नहीं बनो अदनान कि अबसे कम तुम खाओ,
दुबले होकर जीवन को तुम स्वस्थ बनाओ।

'हिचकी'

खैर, प्रश्न आज भी वहीं का वहीं है। हमनें यह सोचकर कि स्टेशन पर लगी मशीनें ग़लत वजन बताती हैं एक वज़न नापने की मशीन भी खरीद ली है, पर वह भी शायद सही वजन नहीं बताती। क्या आप में से किसी नें मोटापे से दुबलापे तक का सफर तय किया है। यदि हाँ तो अवश्य बताइएगा कि आपने क्या किया तथा हम क्या करें। क्या कोई ऐसा तरीका है जिसके द्वारा आराम से, आलसाते हुए वजन को नियमित रूप से कम किया जा सके?

बाकी हमनें सोचा है कि हम ब्लाग पर अपना वज़न अपडेट करते रहेंगे शायद यह एक मोटिवेशन के रूप में काम करे। सो जब आखिरी बार नापा गया था तो हमारा वजन था १०४ किलो (२३० पाउन्डस) जबकी कदानुसार हमारा सही वजन होना चाहिए लगभग ८५ किलो (१८७ पाउन्डस)।

पेड़ बरगद का कोई ढहने को बाकी न रहा

May 5, 2007

पेड़ बरगद का कोई ढहने को बाकी न रहा,
बूढ़े घुटनों की कसक सहने को बाकी न रहा,

पीली गौरैया के घर के सारे बच्चे उड़ गए,
घोसलों में आदमी रहने को बाकी न रहा,

भयंकर सूखा पड़ा फिर भावना के खेत में,
एक मोती आंख से बहने को बाकी न रहा,

कल वो मेरे नाम को सुनकर ज़रा शरमाई थी,
अब ग़ज़ल में और कुछ कहने को बाकी न रहा।

साथ ऐसे रहें, जैसे परिवार हों

Apr 19, 2007

हम गुनहगार हों, चाहे बीमार हों,
चाहे लाचार हों, चाहे बेकार हों,
जो भी हों चाहे, जैसे भी हों दोस्तों,
साथ ऐसे रहें, जैसे परिवार हों,

कुछ नियम से बहे स्वस्थ आलोचना,
हो दिशा सूर्योन्मुख सकारात्मक,
व्यर्थ में जो करे बात विघटनमुखी,
उससे क्या तर्क हों, आर हों, पार हों,

हम पढें, हम लिखें, सबसे ऊँचा दिखें,
ज़ोर पूरा लगाकर, वहीं पर टिकें,
उसपे ये शर्त रखी है सरकार नें,
फैसले सब यहीं बीच मंझधार हों,

ये भरोसा है हमको जड़ों पर अभी,
हमको आंधी से ख़तरा नहीं है मगर,
ये ज़रूरी है सबके लिए जानना,
कब रहें बेखबर, कब ख़बरदार हों,

शब्द हल्के रहें, चाहे भारी रहें,
भावनाओं के संचार जारी रहें,
अच्छे शायर बनें न बनें दोस्तों,
अच्छा इंसान बनने का आधार हों,

भाई, जुर्म यहाँ कम है

Apr 5, 2007

जो कह रहे हैं,
"भाई, जुर्म यहाँ कम है",
सचमुच,
उनकी एक्टिंग में बड़ा दम है,
यहाँ मुझे लग रहा है,
साढ़े पाँच बज गए हैं,
रात,
धीरे धीरे,
अपनी चादर फैलाएगी,
ट्यूशन छूटने में एक घंटा बाकी है,
मेरी बेटी,
घर वापस कैसे आएगी।

कहाँ निशान लगाएँ

Mar 31, 2007

कहाँ से आया है पत्थर हमें नहीं मालूम,
सभी मीनारें हमें एक जैसी लगती हैं,
कहाँ निशान लगाएँ ज़रा बताओ हमें,
सभी दीवारें हमें एक जैसी लगती हैं।

ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है

Mar 27, 2007

वक्त की झील में तस्वीर बना देती है,
दर्द दे दे के उम्मीदों की दुआ देती है,

कभी आंखों में सजाती है सुनहरे सपने,
कभी ख्वाबों के चिरागों को बुझा देती है,

दिन उगेगा तो ये सूरज की बाँह थामेगी,
अंधेरी रात में दीपक को जला देती है,

हर सबक कैद नहीं होता है किताबों में,
ज़िन्दगी भी बहुत से दाँव सिखा देती है।