एक योगाचार्य नें मशाल उठाई,
गाँव गाँव चेतना की ज्योति जगाई,
प्रेरणा दी देशवासियों को योग से,
मुक्त किया कितनों को कष्ट रोग से,
भ्रष्टता को जड़ से मिटाने के लिए,
लड़ा दूसरा स्वराज लाने के लिए,
लाठियां पड़ीं औ दगे हैं आंसू बम,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
घोटालों पे घोटालों का है अटूट क्रम,
टूट चुका गांधीजी का रामराजी भ्रम,
खीसें हैं निपोर रहे नेता बेशरम,
मालियों से कर रहा बगावत चमन,
गूंजने लगा है जयघोष से गगन,
मुट्ठियों को भींचे हुए देखेंगे न हम,
राष्ट्र चेतना में सराबोर जन जन,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
अपने कपट को छुपाने के लिए,
भारत को बेच बेच खाने के लिए,
काले धन में सदा नहाने के लिए,
खाता स्विस बैंक का बचने के लिए,
आन्दोलन दो कुचल ज़ोर से,
देश कहीं जाग नहीं जाए शोर से,
जो उठाये सिर उसे कर दो कलम.
मुट्ठियों को भींचे हुए देखेंगे न हम.
अ से आर्यव्रत की वे आन बान हैं,
न से न्यायशीलता का नव विधान हैं,
ना से नागरिकों की नयी पुकार हैं,
ह हमारी भारती के पुष्प हार हैं,
जा से जानदार हैं जुझारू वीर हैं,
रे से रेशमी उजालों के फ़कीर हैं,
अन्ना जी सिखाते हमें युग का धरम,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
देश भूल सकता न परशु राम को,
विश्वामित्र मांग ले गए थे राम को,
विश्व गुरु के दिए गीता के ज्ञान को,
या दधीचि के महान अस्थिदान को,
दुनिया जगाते गांधी के प्रबंध को,
चाणक्य नें पाठ पढाया जो नन्द को,
संत हैं सिखाते हमें जीने का चलन,
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
बा से बाबाजी हमारे बेमिसाल हैं,
बा से बाहरी कुटिलता का काल हैं,
रा हमारे राष्ट्र की वे पहचान हैं,
म से मातृभूमि का मधुर गान हैं,
दे से देवताओं के वे समतुल्य हैं,
व विजयी, वरदानी हैं अतुल्य हैं,
इस युग के पतंजलि को नमन.
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
कालिमा नें उंगली उठाई धुप पे,
टिपण्णी की बाबाजी के नारी रूप पे,
सामने की दुष्टता का जो न हो चरम,
तो उठाने पड़ते हैं ऐसे भी कदम,
भस्मासुर नहीं यूँ ही मरा था,
भगवान नें भी नारी रूप धरा था,
भक्त नें किया है उसी का अनुकरण.
क्रांति की देखो चली चली रे पवन.
युग धर्म - एक चेतना गीत
Jun 11, 2011प्रेषक: अभिनव @ 6/11/2011 1 प्रतिक्रियाएं
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करामात
Jun 5, 2011Abhinav Shukla
206-694-3353
प्रेषक: अभिनव @ 6/05/2011 2 प्रतिक्रियाएं
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चार जून - हृदय का गान
Jun 3, 2011प्रेषक: अभिनव @ 6/03/2011 0 प्रतिक्रियाएं
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तेरे आने से बिटिया......
Apr 23, 2011मधुर मधुर गीतों में रस की फुहारें ज्यों,
ज़िन्दगी के कैनवस पे रंग प्यारे प्यारे ज्यों
सुबह की सैर में हों धूप के इशारे ज्यों,
सतरंगी चूनर पे टंके हों सितारे ज्यों,
तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है,
फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.
तू जन्मों से संचित किसी पुण्य के फल सी,
मन के मरुस्थल में बूँद बन के आई है,
जब तुझको देखा तो ऐसी अनुभूति हुयी,
जीवन में रुनझुन है गूंजी शहनाई है,
नवयुग की नव बेला राह देखती तेरी,
तू इसमें जीवन की परिभाषा बन जाना,
प्रकृति का तेज त्याग तप तुझमें वास करे,
तू दृढ संकल्पों की अभिलाषा बन जाना,
तेरा अस्तित्व रहे सदा सूर्य सा दीपित,
तेरा प्रवाह, बहें गंगा के धारे ज्यों,
तेरे आने से बिटिया मौसम यूँ महका है,
फूलों की बगिया में आई हों बहारें ज्यों.
प्रेषक: अभिनव @ 4/23/2011 11 प्रतिक्रियाएं
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बाबा विश्वनाथ का त्रिनेत्र खुल जाएगा
Dec 9, 2010भोले भाले लोग गंगा आरती में तल्लीन,
पलकों को मूंदे किये मन में विधाता को,
धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य लिए श्रद्धालु,
दे रहे थे हाथ जोड़े धन्यवाद् माता को,
ठीक उसी क्षण किया असुरों नें उत्पात,
सुरसरी, गंगा मैया रक्त से नहा गयीं,
दुष्ट दानवों की पापमयी ये कुटिल लीला,
एक छोटी बिटिया को संग में बहा गयी,
कौन सी जिहाद, कैसी कौम, कैसा इस्लाम,
तुमको सिखाता भोले मासूमों को मारना,
पहले तो जा के इंसान बन दिखलाओ,
फिर हो सके तो तुम कोई धर्म धारना,
'माय हार्ट गोज़ आउट' शब्दों में बोल कर,
समिति गठित कर आप मत छूटिये,
बांसुरी बजाना छोड़ मेरे मनमोहनजी,
'सत श्री अकाल' बोल दुश्मनों पे टूटिये.
भारत की पुण्य भूमि क्षमाशील है परन्तु,
शिशुपाल का हर एक पाप तुल जाएगा,
दोज़ख में भी न छिप कर रह पाओगे जो,
बाबा विश्वनाथ का त्रिनेत्र खुल जाएगा.
प्रेषक: अभिनव @ 12/09/2010 1 प्रतिक्रियाएं
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ज़िन्दगी, तू मुझे सताना छोड़ दे
Oct 12, 2010प्रेषक: अभिनव @ 10/12/2010 3 प्रतिक्रियाएं
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