कविवर देवेन्द्र शुक्ल को समर्पित एक काव्य संध्या

May 3, 2010

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश मंडल आफ अमेरिका (उपमा) द्वारा आयोजित कवि सम्मलेन में जाना हुआ. कार्यक्रम में शकुंतला बहादुर, नीलू गुप्ता, अर्चना पंडा, संजय माथुर, कोहिनूर चटर्जी सहित बे एरिया के अनेक कवियों को सुनाने का सुखद अनुभव प्राप्त हुआ. मुझे यह कवि सम्मलेन अन्य अनेक कार्यक्रमों से अलग लगा अतः सोचा कि क्यों न अपने अनुभवों को ब्लॉग के रूप में सहेज लूं.

यह कार्यक्रम बे एरिया के लोकप्रिय हास्य कवि स्वर्गीय श्री देवेन्द्र शुक्ल जी की पावन स्मृति को समर्पित था. अमेरिका में आई इस आर्थिक मंदी के क्रूर पंजों नें देवेन्द्र जी को छीन कर मुझे व्यक्तिगत रूप से आहात किया है. इससे पहले मैं जब जब सैन फ्रांसिस्को की ओर गया तब तब मंच पर देवेन्द्र जी मेरे साथ रहे. मैंने उन्हें इस बार बहुत मिस किया. इस कर्यक्रम में मंच पर देवेन्द्र जी के लिए एक खाली कुर्सी रखी गयी थी. उस कुर्सी के आगे दीपक जलाये गए तथा बाकी सभी कवि मंच के नीचे बैठे. बड़े भावपूर्ण रूप में उपमा की अध्यक्षा नीलू गुप्ता जी नें देवेन्द्र जी की स्मृतियों को प्रणाम किया तथा सब श्रोताओं नें दो मिनट का मौन रखा. आम तौर पर श्रधांजलि एक औपचारिकता मात्र होकर रह जाती है, पर इस कार्यक्रम में ऐसा नहीं लगा. नीलू जी नें अपनी संस्था के सदस्यों को एक एक कर के मंच पर बुलाया. सबको बुलाते समय उनहोंने काव्यात्मक पंक्तियाँ पढ़ीं तथा सबका बड़ा अच्छा परिचय दिया. संस्था से सदस्य एक एक कर मंच पर आये और एक एक दीपक जला कर अपने स्थान पर लौट गए.

आज के दौर में कवि सम्मलेन के मंचों से काव्यधारा सूखती जा रही है तथा लाफ्टर धारा उफान पर है. ऐसे में इस कार्यक्रम में कुछ नए तरीके की अच्छी हास्य रचनायें भी सुनने को मिलीं. एक ओर जहाँ कोहिनूर द्वारा प्रस्तुत 'छप छपाक' में किसी नृत्यांगना के कदमों की थाप की ध्वनि सुनने को मिली तो वहीं संजय नें मूछों पर एक हास्य रचना पढ़ी. वरिष्ठ कवयित्री शकुंतला बहादुर नें कम सुनने की समस्या पर एक हास्य रचना पढ़ी. लोकप्रिय कवयित्री अर्चना पंडा नें अपने रेडियो जनित अनुभवों को कविता में बाँधा. जो बात अच्छी लगी वो यह की अधिकतर कवितायें जीवन के अनुभवों से निकली थीं तथा किसी भी प्रकार की कृत्रिमता से दूर थीं. भोगे हुए यथार्थ का चित्रण निसंदेह अधिक गहरी पैठ रखने वाला होता है.

"नौकरी की टोकरी" जैसी, अमेरिका आई नारी के मन को प्रतिबिंबित करती सटीक रचना लिखने वाली अर्चना जी नें अपने काव्य पाठ के कुछ अंश यू ट्यूब पर भी अपलोड किये हैं. आप कार्यक्रम के कुछ चित्रों को नीचे देख सकते हैं.















शर्मा बंधुओं द्वारा मानस अनुष्ठान - १४, १५ एवं १६ मई - बंगलूरू के मित्र अवश्य जाएँ

Apr 28, 2010

मेरे बड़े भाईसाहब डॉ आदित्य शुक्ल रामचरितमानस के प्रबुद्ध वक्ता है. उन्होंने ये जानकारी दी थी कि ब्रह्मवादी सांस्कृतिक संघ, शर्मा बंधुओं द्वारा मानस अनुष्ठान कराने के विषय में विचार कर रहा है. आज उनकी ई मेल से सूचना प्राप्त हुयी कि कार्यक्रम १४, १५ एवं १६ मई को है. मेरा आपसे अनुरोध है कि जो मित्र बंगलूरू में हैं वे इसमें अवश्य जाएँ और जो वहां नहीं हैं वे अपने मित्रों तक ये सूचना पहुँचाने की कृपा करें. शर्मा बंधुओं द्वारा प्रस्तुत "सूरज की गर्मी से" तो आपको याद ही होगा, उनके द्वारा प्रस्तुत रामायण की एक बानगी आप नीचे दिए वीडियो में देख सकते हैं.



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Brahmvadi Sanskritk Sangh (R), Bangalore is a committed organization towards Social upliftment and Cultural development. This Year is the Silver Jubilee Year of the organization. In the wake of this celebration, the BSS had decided to organize various cultural, literary and social activities.

In the subsequent, Sangh is going to organize “MANAS ANUSHTHAN” on 14th, 15th and 16th May 2010 at Chowdiah Memorial Hall, Bangalore. In this program renowned Bhajan Singers “SHARMA BANDHU” will perform the distinctive singing and unique interpretation of Shri Ramcharitmanas an eternal epic of Goswami Tulsidas.

My humble request you to participate in the above program.

You can call me for more info.

Regards
Aditya
9844503371

नव निधि के उजाले

Apr 26, 2010

ज्ञान के कारागृहों में दंभ के मुस्तैद ताले,
भवन की ऊँची छतों पर रूढ़ियों के सघन जाले,
देख कर विज्ञान की प्रगति विधि भी है अचंभित,
हो पुरातन या नवल जो व्यर्थ है, वो सब तिरोहित,
हम पताका हम ध्वजा हम स्वयं ही पहिये हैं रथ के,
दो दिशाओं में हैं गुंजित स्वर जगत में प्रगति पथ के,
पीढियां अक्षम हुयी हैं निधि नहीं जाती संभाले,
पीढियां सक्षम हुयी हैं नव निधि के हैं उजाले.

सुनिए साक्षात्कार - जसपाल भट्टी एवं सविता भट्टी को विवाह की रजत जयंती की शुभकामनाएं

Mar 24, 2010



इधर अमेरिका के पूर्वी तट पर हुए एक कार्यक्रम में सविताजी एवं जसपाल भट्टी जी से मिलने का सुअवसर मिला. हमें भी कवितायें सुनाने के लिए इस कार्यक्रम में बुलाया गया था. भट्टी जी के फैन तो हम बचपन से हैं. मौके का लाभ उठाते हुए हमने उनका साक्षात्कार भी ले लिया. आप नीचे सुन सकते हैं. कार्यक्रम के कुछ चित्र भी दिए जा रहे हैं.

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आज इनके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ है, इस अवसर पर सविताजी और जसपालजी को अनेक शुभकामनाएं.

उल्टा पुल्टा हो रहा दुनिया का हर काम,
फुल टेंशन में खो गया जीवन का आराम,
जीवन का आराम फ्लॉप शो बना हुआ है,
चेहरा फिर भी मुस्कानों से सना हुआ है,
सविता औ जसपाल व्यंग के बाण चलायें,
महकें चहकें लहकें हरदम हसें हसायें.

















जली बरेली, हमको क्या?

Mar 15, 2010

नकली जीवन जी कर असली गीत लिखें ये मुश्किल है,
लेकिन असली जीवन भी क्या अब जीने के काबिल है,

प्रश्न बड़ा है, अड़ा पड़ा है, और खड़ा है रस्ते पर,
टंका हुआ है चाँद सितारा, क्यों मुजरिम के बस्ते पर,

भूख, गरीबी, मज़हब, बीबी, बदला खून खराबे का,
इन सब में ही छिपा है जंतर मंतर काशी काबे का,

बम्ब धमाके, चोरी डाके, खूब ठहाके, हमको क्या?
होली खेली, रंगी हथेली, जली बरेली, हमको क्या?

पिलखुवा में हुयी हास्य दर्शन काव्य संध्या

Feb 22, 2010




















अमौसा का मेला - श्री कैलाश गौतम

Jan 16, 2010

अमिताभजी नें ई कविता पर 'अमौसा का मेला' पोस्ट की है. इसे अपने ब्लॉग पर पोस्ट करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. कैलाश गौतम जी की स्मृतियाँ एक बार पुनः आँखों के आगे आ गयीं. ऐसा लगा मानो हम आकाशवाणी में बैठे हैं और वो कह रहे हों, ज़रा लड़के को चाय पिलाओ. खैर, आप देखिये सुनिए और पढ़िए एक अद्भुत कविता. अमिताभजी को अनेक धन्यवाद् के साथ.




ई भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा
धरम में करम में सनल गाँव देखा
अगल में बगल में सगल गाँव देखा
अमवसा नहाये चलल गाँव देखा॥

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा
अ कमरी में केहू, रजाई में केहू
अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू
अ आजी रंगावत हईं गोड़ देखा
हँसत ह‍उवैं बब्बा तनी जोड़ देखा
घुँघुटवै से पूँछै पतोहिया कि अ‍इया
गठरिया में अबका रखाई बत‍इहा
एहर ह‍उवै लुग्गा ओहर ह‍उवै पूड़ी
रमायन के लग्गे हौ मड़ुआ के ढूँढ़ी
ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी
अ नयका चपलवा अचारे के ओरी

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

मचल ह‍उवै हल्ला चढ़ावा उतारा
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गुर्रा ओहर लोली-लोला
अ बिच्चे में ह‍उवै सराफत से बोला
चपायल हौ केहू, दबायल हौ केहू
अ घंटन से उप्पर टंगायल हौ केहू
केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर
केहू फनफनात ह‍उवै कीरा के नीयर
अ बप्पारे बप्पा, अ द‍इया रे द‍इया
तनी हमैं आगे बढ़ै देत्या भ‍इया
मगर केहू दर से टसकले न टसकै
टसकले न टसकै, मसकले न मसकै
छिड़ल हौ हिताई नताई क चरचा
पढ़ाई लिखाई कमाई क चरचा
दरोगा क बदली करावत हौ केहू
अ लग्गी से पानी पियावत हौ केहू

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

जेहर देखा ओहरैं बढ़त ह‍उवै मेला
अ सरगे क सीढ़ी चढ़त ह‍उवै मेला
बड़ी ह‍उवै साँसत न कहले कहाला
मूड़ैमूड़ सगरों न गिनले गिनाला
एही भीड़ में संत गिरहस्त देखा
सबै अपने अपने में हौ ब्यस्त देखा
अ टाई में केहू, टोपी में केहू
अ झूँसी में केहू, अलोपी में केहू
अखाड़न क संगत अ रंगत ई देखा
बिछल हौ हजारन क पंगत ई देखा
कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ
कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ
केहू बुढ़िया माई के कोरा उठावै
अ तिरबेनी म‍इया में गोता लगावै
कलपबास में घर क चिन्ता लगल हौ
कटल धान खरिहाने व‍इसै परल हौ

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

गुलब्बन क दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव ज‍इसे नदी तीरे-तीरे
सजल देह हौ ज‍इसे गौने क डोली
हँसी हौ बताशा शहद ह‍उवै बोली
अ देखैलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का
फुटेहरा नियर मुस्किया-मुस्किया के
ऊ देखेलीं मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलैंलीं
अ नरियर पे नरियर चढ़ावत चलैलीं
किनारे से देखैं इशारे से बोलैं
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं
बड़े मन से मन्दिर में दरसन करैलीं
अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं
चढ़ावैं चढ़ावा अ गोठैं शिवाला
छुवल चाहैं पिन्डी लटक नाहीं जाला

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

बहुत दिन पर चम्पा चमेली भेट‍इलीं
अ बचपन क दूनो सहेली भेंट‍इलीं
ई आपन सुनावैं ऊ आपन सुनावैं
दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं
असों का बनवलू असों का गढ़वलू
तू जीजा क फोटो न अब तक पठवलू
न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं
हमैं अपनी सासू क पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी क पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की
चलत ह‍उवै टेम्पो चलत ह‍उवै चक्की
मनैमन जरै अ गड़ै लगलीं दूनों
भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगली दूनों
अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै
अ हलुवाई ज‍इसे कराही छोड़ावैं

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

कलौता क माई क झोरा हेरायल
अ बुद्धू क बड़का कटोरा हेरायल
टिकुलिया क माई टिकुलिया के जोहै
बिजुलिया क भाई बिजुलिया के जोहै
माचल ह‍उवै मेला में सगरों ढुंढाई
चमेला क बाबू चमेला का माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले
अ छोटकी बिटिउवा क मारत चलैले
बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले
गोबरधन क सरहज किनारे भेंट‍इलीं
गोबरधन के संगे प‍उँड़ के नह‍इलीं
घरे चलता पाहुन दही-गुड़ खियाइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं फेंक गठरी पर‍इलैं गोबरधन
न फिर-फिर देख‍इलैं धर‍इलैं गोबरधन

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै
केहू बस अटैची क ताला मोलावै
केहू चायदानी पियाला मोलावै
सोठ‍उरा क केहू मसाला मोलावै
नुमाइस में जातैं बदल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया से आगे निकल ग‍इलीं भ‍उजी
हिंडोला जब आयल मचल ग‍इलीं भ‍उजी
अ देखतै डरामा उछल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया बेचारू जोड़त ह‍उवैं खरचा
भुल‍इले न भूलै पकौड़ी क मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी क चिन्ता
बहिनिया क गौना मसहरी क चिन्ता
फटल ह‍उवै कुरता फटल ह‍उवै जूता
खलित्ता में खाली केराया क बूता
तबौ पीछे-पीछे चलत जात ह‍उवन
गदेरी में सुरती मलत जात ह‍उवन

अमवसा क मेला अमवसा क मेला
इह‌इ ह‍उवै भ‍इया अमवसा क मेला॥

- कैलाश गौतम