(डा बृजेन्द्र अवस्थी बैंगलोर के टाऊनहाल में काव्य पाठ करते हुए)
डा अवस्थी पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे, पहले कुछ दिनों तक बदायूँ में इलाज होने के बाद उन्हें लखनऊ के पीजीआई में भरती किया गया। लगभग तीन सप्ताह पहले जब उनसे मेरी बात हुई तो पता चला कि उनका स्वास्थ्य कुछ खराब चल रहा है। मैंनें पूछा तो वे बोले अरे बेटा, ये तो बुढ़ापे की बिमारियाँ हैं हमारे साथ ही जाएँगी। किसे पता था कि ये बीमारियाँ उन्हें हमारे बीच से ऐसे लेकर चली जाएँगी। उन्होंने यह भी बतलाया कि शंकराचार्य पर लिखा हुआ उनका महाकाव्य पूरा हो रहा है। पिछले तीन चार वर्षों में उनहोंने शिवाजी, बजरंग बली, परशुराम तथा अब शंकराचार्य पर अद्भुत महाकाव्यों की रचना की है। डा अवस्थी नें जिस जिस पात्र पर लिखा उस उस के साथ संपूर्ण न्याय किया है। उनके काव्यों में भाषा शिल्प और शब्द संयोजन का चमत्कार तो है ही पर संग में है एक ऐसी गैहरी पैठ कि इन ग्रन्थों का उपयोग शोध हेतु किया जा सकता है।
कारगिल युद्ध के समय लिखी गई उनकी पुस्तक 'जवानों ज़िन्दाबाद' का विमोचन लखनऊ महोत्सव १९९९ में हुआ, अपने सौभाग्य से मैं भी उस दिन मंच पर उनकी सेवा में उपस्थित था। उस दिन अवस्थी जी नें अपनी इसी पुस्तक के छन्द श्रोताओं को सुनाए। अपने विशिष्ट अंदाज़ एवं बुलंद आवाज़ में सुनाई गई पंक्तियाँ आज भी मेरे मन में ऐसे गूँज रहीं हैं जैसे मानो कल की ही बात हो।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन मनोज पाण्डेय पर लिखा हुआ उनका यह छन्द सुनकर सभागार बडी़ देर तक तालियों से गूंजता रहा,
माता ब्रजमोहनी का लाल लखनऊ ही क्या,
लाल सारे भारत का ही अनन्य हो गया,
हिमवात चीर टाईगर जय हेतु बढ़ा,
अभियान अमित प्रभावजन्य हो गया,
कैप्टन मनोज पाण्डेय राष्ट्र को दे बलिदान,
वीर बलिदानियों में अग्रगण्य हो गया,
परमवीर चक्र से वो आहुति न धन्य हुई,
आहुति से परमवीर चक्र धन्य हो गया।
युद्ध के समय एक माँ के संशय को दर्शाता यह छन्द सुनकर किसका हृदय ना गर्व से तन जाए,
युद्ध भूमि छिन्न भिन्न शवों से भयानक है,
रात का सघन अंधकार गहराया है,
हाथ में मशाल लिए तू क्या यहाँ खोज रही,
मैया तूने भी क्या किसी रत्न को गंवाया है,
बोली मेरा इकलौता लाल बलिदान हुआ,
गर्व भरा मैंने समाचार अभी पाया है,
खोजती उसी की लाश यह देखने के लिए,
पीठ पर उसने तो घाव नहीं खाया है।
युद्ध के समय स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का पुनीत संकल्प याद दिलाता यह छन्द सुनकर शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती है,
छोटे छोटे बच्चों नें अटलजी को पत्र लिखा,
पूज्य श्री अटलजी हमारा ध्यान करेंगे,
नाश्ते के पैसे हम जोड़ जोड़ भेज रहे,
उनको शहीदों के लिए प्रदान करेंगे,
हमलावरों को शीघ्र धरा की चटा के धूल,
ऊँचा इस धरती का स्वाभिमान करेंगे,
जब तक देश की सीमाओं पर युद्ध होगा,
तब तक हम नहीं जलपान करेंगे।
डा अवस्थी की वाणी के ओज से पूरे सभागार में रात के तीन बजे एक अद्भुत जोश एवं चेतना का संचार हो गया था।
वैसे तो डा अवस्थी हर रस में कविता करते थे पर मंचों पर उन्हें मुख्यतः राष्ट्रीयता के स्वर से ओत प्रोत कविताओं के लिए जाना जाता था। वे अद्भुत आशुकवि थे, बात की बात में छन्द रच देने की उनकी क्षमता अतुलनीय थी।
सियारामशरण तक लगा प्राण का दाँव गए हैं,
तुलसी के पदचिन्हों पर धर पाँव गए हैं,
पूज्य मैथलीशरण मैथली शरण प्राप्त कर,
छोड़ एक चिरगाँव, एक चिरगाँव गए हैं।
मैथलीशरण गुप्त के देहवसान के समय डा बृजेन्द्र अवस्थी नें यह पंक्तियाँ लिखी थीं। आज वे स्वयं तुलसी के पदचिन्हों पर पाँव धर के जा चुके हैं। डा अवस्थी के जाने से हिंदी कविता के एक युग का अंत हुआ है किंतु उन्होंने जो कविताएँ लिखी हैं वे आने वाले युगों युगों तक मानव समाज को उत्कृष्ट साहित्य से परिचित कराती रहेंगी। अपने स्वाभिमान एवं संस्कारों को सबसे अधिक महत्ता देने वाले डा अवस्थी का विराट व्यक्तित्व अपने आप में निराला है। नए एवं उदीयमान कवियों को प्राश्रय तथा उनके काव्य को सही दिशा देने का कठिन संकल्प डा अवस्थी नें आजीवन निभाया। आज उनके अनेक शिष्य हिन्दी काव्य जगत में अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं। उनके जाने से हिन्दी जगत को तो अपूर्व क्षति हुई ही है, वहीं अनेक कवियों नें अपने आदर्श पितामाह एवं गुरू को खो दिया है। व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा लग रहा है मानो मेरे हृदय में एक शून्य सा उत्पन्न हो गया हो, एक ऐसा शून्य जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकेगी।
अपने कद से ना घटें कभी,
सच्चाई से ना हटें कभी,
आंधी में अविचल टिक जाएँ,
हम तुम कुछ अच्छा लिख जाएँ,
वह ही सच्चा अर्पण होगा,
वह सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।
इस शनिवार को सिएटल में डा बृजेन्द्र अवस्थी की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। हमारा प्रयास है कि इसे हम मेसेन्जर द्वारा अंतरजाल पर प्रसारित करें। यदि आप इस कार्यक्रम में डा अवस्थी को श्रद्धान्जलि देते हुए कुछ कहना चाहते हैं अथवा उनसे जुड़ा अपना कोई संस्मरण सुनाना चाहते हों तो कृपया मुझे निम्न पते पर एक ई-मेल भेजें।
shukla_abhinav at yahoo.com
कार्यक्रम का समय है:
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ४ से ५ (पी एस टी - सिएटल)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ५ से ६ (एम एस टी - फीनिक्स)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ६ से ७ (सी एस टी - शिकागो)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ७ से ८ (ई एस टी - न्यूयार्क)
२८-जनवरी-२००७ रविवार - मध्यरात्रि १२ से १ (जी एम टी - इंगलैंड)
२८-जनवरी-२००७ रविवार - प्रातः ५-३० से ६-३० (आई एस टी - भारत)
(डा बृजेन्द्र अवस्थी का बैंगलोर एयरपोर्ट पर स्वागत करते हुए अभिनव शुक्ल)
नोटः २००५ में डा अवस्थी बैंगलोर आए थे, उनके सम्मान में वहाँ एक बडी़ आत्मीय सी और छोटी सी काव्य गोष्ठी आयोजित की गई थी। उस गोष्ठी के कुछ अंश यहाँ हैं, वीडियो बहुत साफ नहीं है पर ध्वनि ठीक है। वीडियो के प्रारंभ में डा अवस्थी अपने संघर्षमय जीवन के विषय में बता रहे हैं तथा फिर उन्होंनें श्रंगार, वात्सल्य, भक्ति रस में डूबी अपनी कविताएं सुनाई हैं तथा अंत में ओज की रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।
तुलसी के पदचिन्हों पर धर पाँव गए हैं - श्रद्धान्जलि
Jan 23, 2007प्रेषक: अभिनव @ 1/23/2007 7 प्रतिक्रियाएं
आओ भाई २००७
Dec 30, 2006मेरा कैलेण्डर बता रहा है,
नया साल आने वाला है,
साथ जो अब तक निभा रहा था,
वह पीछे जाने वाला है,
चलो उठें हम, पुनः अंगड़ाई लेकर कुछ संकल्प करें,
ये करना है, वो करना है, कहें अधिक पर अल्प करें,
फिर वापस पटरी पर आएँ, गीत पुराने सुर में गाएँ,
आलस का बादल भी हम पर,
कुछ दिन में छाने वाला है,
मेरा कैलेण्डर बता रहा है,
नया साल आने वाला है,
पिछले वर्ष भी सूरज कितने अंधकार से छले गए,
बिस्मिल्लाह शहनाई मधुर सी संग में लेकर चले गए,
गौतम गए प्रभु से मिलने, श्याम श्याम के आंगन खिलने,
मायाजाल बिछाती दुनिया,
सचमुच में गड़बड़झाला है,
मेरा कैलेण्डर बता रहा है,
नया साल आने वाला है,
मेरी विनति है ईश्वर से शुद्ध प्रेम की धारा हो,
मिले प्रमोशन सबको जग में सबके घर उजियारा हो,
शांति पताका जग पर फहरे, पत्नी का बेलन ना लहरे,
चटख़ चटाख़ा फटक फटाका,
कविताएँ लाने वाला है,
मेरा कैलेण्डर बता रहा है,
नया साल आने वाला है,
प्रेषक: अभिनव @ 12/30/2006 1 प्रतिक्रियाएं
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बस है पन्द्रह आठ सैंतालिस नम्बर की
Dec 29, 2006लुटी फिर बस है पन्द्रह आठ सैंतालिस नम्बर की,
फटी सीटें हैं कुछ गायब हुए हैं पेंच पहियों के,
मैं सुनता हूँ कि जीडीपी बढ़ा सनसेक्स उछला है,
हमारे घर के अन्दर हाल हैं बेहाल कइयों के,
कोई कहता है बीमारू कोई पिछड़ा बताता है,
भला सुधरेंगे दिन कैसे मेरे भारत में भइयों के,
वो सूखा पेड़ मुझसे कह रहा था एक दिन प्यारे,
कभी मेरी भी शाखों पर घरौंदे थे चिर्इयों के,
प्रेषक: अभिनव @ 12/29/2006 2 प्रतिक्रियाएं
Labels: गीतिका
इलेक्शन आ रहे हैं दोस्तों
Dec 28, 2006करो मत व्यर्थ जीवन का प्रबल आधार हो जाओ,
ना बन पाओ यदि तुम गुल, नुकीले ख़ार हो जाओ,
सुबह उठ कर नहाते हो औ पूजा पाठ करते हो,
अमाँ तुम आदमी अब हो गए बेकार हो जाओ,
चिलम को हाथ में लेकर लगाओ कश पे कश प्यारे,
चलो मूँदो ये आँखें डूब जाओ पार हो जाओ,
ज़रा पेटी कसो बंदूक की गोली भी चेक कर लो,
इलेक्शन आ रहे हैं दोस्तों, तैयार हो जाओ,
प्रेषक: अभिनव @ 12/28/2006 5 प्रतिक्रियाएं
Labels: गीतिका
कविता और पब्लिक ओपिनियन
Dec 22, 2006एक लम्बे समय तक चले,
घनघोर शीतयुद्ध के बाद,
जब घर पर पिताजी नें हमें,
नालायक शिरोमणी की उपाधि करते हुए,
हमारे कवि हो जाने का ऐलान किया,
तब हमें अपना भविष्य बिल्कुल क्लियर दिखाई दिया,
दूर दूर तक कुछ भी नहीं था,
और जो दिख रहा था वह बिल्कुल सही था,
खैर, युद्ध विराम कि स्तिथि के कारण,
एल ओ सी पर शांति व्यवस्था बहाल हो गई थी,
हम और पिताजी आपस के बैर भुला कर,
कभी कभार,
एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा लेते थे,
पिताजी मुस्कुराते हुए सोचते होंगे कि,
'बच्चू, अभी दो ही दिन में आटे दाल का भाव मालूम पड़ जाएगा,'
हम ये सोचते थे कि,
जब कविता करके आदमी प्रधानमंत्री बन सकता है,
नोबल पुरुस्कार की दौड़ में शामिल हो सकता है,
मंच पर बातें बना कर अच्छे अच्छों को धो सकता है,
तो अपना भी झंडा किसी ऊँची चोटी पर जाकर गड़ जाएगा,
लेकिन अपना भविष्य ऐसे कैसे दांव पर लगा दिया जाए,
कविता के बारे में पब्लिक ओपिनियन क्या है पता किया जाए,
पिताजी तो अपनी राय पहले ही दे चुके थे,
कविता मात्र अमीरों का सौंदर्य प्रसाधन है,
समय नष्ट करने का एक निकृष्ट साधन है,
तुम्हे आई आई टी में सेलेक्ट हुए अपने मामा से कुछ ज्ञान लेना चाहिए,
केवल पढ़ाई की ओर ध्यान देना चाहिए।
मां नें कहा,
बेटा, बचपन में हम लोग कवि सम्मेलन सुनने जाते थे,
अपनी डायरियों में भी कविताएँ नोट करके लाते थे,
कवि वही है जो ह्रदय से सच्चा हो,
वैसे तुम भी लिखते अच्छा हो,
पर अब कविता में कुछ बचा नहीं है,
नए लोगों को ये सब जंचा नहीं है,
छोटे भाई नें कहा,
अबे, मेरे आयल फ्री पापड़ पर चुपड़े हुए मक्खन,
मिट्टी के तेल के पीपे के अन्दर वाले ढक्कन,
तू बड़ा महान है, वीर हनुमान है,
हम जैसे लोगों का राबिनहुड है,
याद रख तेरा लक्ष्य बालीवुड है,
तू वहां पहुँच कर गीतकार बन जा,
फिर मेरे वहां पहुँचने की बात चला,
वैसे कविता में लेना चाहिए नए शब्दों का सहारा,
जैसे कठफोड़वा, फड़फड़ाहट, लक्कड़हारा,
इस मामले में पत्नी से हमारी अच्छी निभ जाती है,
उसे हमारी भाषा समझ ही नहीं आती है,
वो कुछ भी कहती है तो हम हाँ में सिर हिलाते हैं,
हम कुछ भी कहते हैं तो वो ना में सिर हिलाती है।
हम फिर घर के बाहर आए,
अन्य लोगों नें भी अपने विचार बताए,
एक नें कहा, कविता का अर्थ, भूख, गरीबी, कमज़ोरी, कड़की है,
दूसरा नें कहा कि, मेरे पड़ोस में रहने वाले डाक्टर साहब की लड़की है,
तीसरे नें कहा खूबसूरत नायिका है,
चौथा बोला, फिल्मों में गायिका है,
पाँचवा बोला, रिसर्च आब्जेक्ट है,
छठा बोला, एम ए का एक सब्जेक्ट है,
सातवां बोला, प्रश्न गहरा है,
आठवां बोला, हमसे मत पूछो, अपन तो जन्मजात बहरा है,
नवाँ बोला, कविता नदी पर बने सुंदर पुल सी है,
दसवाँ बोला, सूर, कबीर, मीरा, तुलसी है,
कोई बोला, कविता देवी माता के आगे जलती ज्योत है,
कोई बोला, हम क्या जानी क्या होत है,
कोई बोला, कविता चार लाईना सुना रिया हूँ है,
कोई बोला, पुराने ज़माने में ही हुआ करती थी रै,
जब यह सवाल हमनें किया मंचों पर धूम धड़ाके से चलने वाले एक कवि से,
जिसकी प्रसिद्धि की तुलना की जा सकती थी रवि से,
तो वह ज़रा देर तक तो रहा विचारों में खोया,
फिर उसने अपनी भावनाओं को ईमानदारी के शब्दों में पिरोया,
फिर बोला,
जब मैंने लिखना शुरू किया था,
तब कविता मानव मन का सम्मान थी,
सरस्वती माता का अनमोल वरदान थी,
पर जब से मंचों के बाज़ार में आया हूँ,
मेरी आत्मा में एक मलाल बो गई है,
कविता, दुकान पर बिकने वाला माल हो गई है,
इन सब महानुभावों की राय के बाद,
जब हमने अपने हृदय से पूछा,
कि कविता क्या होती है उस्ताद,
तो उसने उत्तर दिया कि,
कविता है बच्चे की किलकारी,
महके हुए फूलों की क्यारी,
चिड़ियों की चहचहाट,
शब्दों की तुतलाहट,
जहाँ कहीं भी भावना है, संवेदना है,
पीड़ा है, वेदना है,
प्रसन्नता है, उल्लास है,
जज़्बात हैं, एहसास है,
और जो वहाँ पर भी है,
जहाँ कुछ भी नहीं है,
कविता वही है।
प्रेषक: अभिनव @ 12/22/2006 7 प्रतिक्रियाएं
Labels: मेरी पसंद, हास्य कविता
मुट्टम मंत्र
Nov 16, 2006
मित्रों यह मंत्र यहाँ पढ़ भी सकते हैं।
प्रेषक: अभिनव @ 11/16/2006 3 प्रतिक्रियाएं
Labels: हास्य कविता
सामयिक कवि की कथा
पहले तो बात सुन के ज़रा डोलते हैं हम,
फिर एक एक करके पर्त खोलते हैं हम,
कुछ मूल जानने की लगाते हैं हम जुगत,
कुछ उसमें छुपे सत्य को टटोलते हैं हम,
जब लगता है ये बात सुनाने के योग्य है,
भाषा की चाशनी में भाव घोलते हैं हम,
कसते हैं कसौटी पे हृदय के कलाम को,
तब जाके चार शब्द कहीं बोलते हैं हम।
प्रेषक: अभिनव @ 11/16/2006 6 प्रतिक्रियाएं
Labels: गीतिका