भोले भाले लोग गंगा आरती में तल्लीन,
पलकों को मूंदे किये मन में विधाता को,
धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य लिए श्रद्धालु,
दे रहे थे हाथ जोड़े धन्यवाद् माता को,
ठीक उसी क्षण किया असुरों नें उत्पात,
सुरसरी, गंगा मैया रक्त से नहा गयीं,
दुष्ट दानवों की पापमयी ये कुटिल लीला,
एक छोटी बिटिया को संग में बहा गयी,
कौन सी जिहाद, कैसी कौम, कैसा इस्लाम,
तुमको सिखाता भोले मासूमों को मारना,
पहले तो जा के इंसान बन दिखलाओ,
फिर हो सके तो तुम कोई धर्म धारना,
'माय हार्ट गोज़ आउट' शब्दों में बोल कर,
समिति गठित कर आप मत छूटिये,
बांसुरी बजाना छोड़ मेरे मनमोहनजी,
'सत श्री अकाल' बोल दुश्मनों पे टूटिये.
भारत की पुण्य भूमि क्षमाशील है परन्तु,
शिशुपाल का हर एक पाप तुल जाएगा,
दोज़ख में भी न छिप कर रह पाओगे जो,
बाबा विश्वनाथ का त्रिनेत्र खुल जाएगा.
बाबा विश्वनाथ का त्रिनेत्र खुल जाएगा
Dec 9, 2010प्रेषक: अभिनव @ 12/09/2010 1 प्रतिक्रियाएं
Labels: कविताएं
ज़िन्दगी, तू मुझे सताना छोड़ दे
Oct 12, 2010ज़िन्दगी, तू मुझे सताना छोड़ दे,
जिन संकरी गलियों में बचपन बैठा है,
उन गलियों में आना जाना छोड़ दे.
मुझसे भूल हुयी, भूल पर भूल हुयी,
जो सोने की रेत संभाल के रखी थी,
जब बक्सा खोला तो वो सब धूल हुयी,
अब सोने का मोह पुराना छोड़ दे.
ज़िन्दगी, तू मुझे सताना छोड़ दे.
पीड़ा नें आभावों के संग ब्याह किया,
हुआ आंकलन जब पूरा तो ये पाया,
मैंने बस कोरे काग़ज़ को स्याह किया,
अब तो झूठा प्यार निभाना छोड़ दे.
उन गलियों में आना जाना छोड़ दे.
-अभिनव
प्रेषक: अभिनव @ 10/12/2010 3 प्रतिक्रियाएं
Labels: कविताएं
डॉ उर्मिलेश की सुप्रसिद्ध कविता - वन्दे मातरम
Sep 27, 2010प्रेषक: अभिनव @ 9/27/2010 4 प्रतिक्रियाएं
Labels: भई वाह
एक छंद
Sep 4, 2010कल रात सपने में आई एक परछाई,
कह गयी मन की उमंग न बदलना,
झूठ की हवाएं चाहे जितनी चिरौरी करें,
सत्य बोलने का कभी ढंग न बदलना,
शब्द शब्द ब्रह्म मान रचना नवल गीत,
टूट टूट गाने की तरंग न बदलना,
कविता से तालियों की रंगत रहे न रहे,
तालियों से कविता का रंग न बदलना.
- अभिनव
प्रेषक: अभिनव @ 9/04/2010 7 प्रतिक्रियाएं
Labels: कविताएं
माखन चोर - डॉ बृजेन्द्र अवस्थी (जन्माष्टमी की अनेक शुभकामनाएं)
Sep 2, 2010आप सभी को जन्माष्टमी की अनेक शुभकामनाएं. डॉ बृजेन्द्र अवस्थी की निम्न कविता में बाल गोपाल द्वारा की गयी माखन चोरी की लीला का बहुत सुन्दर वर्णन पढने को मिलता है. यदि संभव हो तो इस कविता को बोल बोल कर पढ़ियेगा, आनंद दूना हो जाएगा.
माखन चोर - डॉ बृजेन्द्र अवस्थी
बिम्ब प्रतिबिंबित उन्हीं के मणि खम्बों पर, भेदिया के मन में संदेह भरने लगे,
भेद खुला जान छांछ उन्हें भी खिलने लगे, झर झर लोचनों से अश्रु झरने लगे,
कहना न मैया से बलिया लूं तुम्हारी भैया, बार बार बिनती कन्हैया करने लगे.
इतने में आ गयीं यशोदा माता उसी ठौर, अंग अंग छांछ लिपटाये नंदलाल थे,
माखन करों से प्रतिबिम्ब को खिला रहे थे, कुंचित कुटिल कुन्तलों के बाल व्याल थे,
खम्ब में स्वरुप, रूप में छवि भरे नयन, नयनों में अश्रु, अश्रुओं में चित्रजाल थे,
मानो क्षीर सिन्धु की नहाई गन माल पर रूप भरे मोती रहे उगल मराल थे.
आया देख माता को अकस्मात् उसी ठौर, सूझी ये नवल लीला नवल किशोर को,
बिम्ब को दिखा के बोल उठे देख देख मैया, यह ढीठ घूर जो रहा है मेरी ओर को,
अभी अभी माखन चुरा के यही खा रहा था, देख व्यर्थ अश्रु से भरे हैं दृग कोर को,
पोर दाबे मुख में हंसी में तो खड़ी विभोर, क्यों नहीं पकड़ती है माखन के चोर को.
मेरे हाथ मुख में लगा ये छांछ देख कर, मैया क्या इसी ने तेरा चित्त भरमाया है,
कहूं सही बात मेरी बात मान मेरी अम्मा, अभी छीना झपटी में इसी ने लगाया है,
तुझको प्रतीति नहीं तो निहार नवनीत उसके ही पास है जो उसी ने चुराया है,
खाया कुछ, कुछ अभी हाथ में बचाया, कुछ मुख पे लगाया, कुछ भूमि पे गिराया है.
प्रेषक: अभिनव @ 9/02/2010 1 प्रतिक्रियाएं
एक गीत - अकेले रहते हैं हम लोग
Aug 11, 2010समूह के सभी सदस्यों को सदर नमस्कार, कुछ दिन पहले आ अनु जी नें 'हास्य दर्शन - २' से कुछ प्रस्तुत करने का आदेश दिया था. लीजिये प्रस्तुत है एक प्रवासी गीत जो कि मन में होने वाले तर्क वितर्क को शब्दों में ढलने का एक प्रयास है.
वहां बच्चों पर काबू है,
वहां के स्वाद में जादू है,
सड़क पर चाट के ठेले हैं,
उन्हीं गलियों में खेले हैं,
कोई बर्तन धो जाता है,
झाड़ू कटका हो जाता है,
कपड़े प्रेस होकर आते हैं,
वहां त्यौहार मनाते हैं,
फिर भी डूबे हैं ख्यालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
आज हैं अपने घर से दूर,
अकेले रहते हैं हम लोग
अकेले रहते हैं हम लोग,
बनाया है जीवन को भोग,
फँस गए हैं जंजालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
बनाया है जीवन को भोग,
फँस गए हैं जंजालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
हुयी जब बहना कि शादी,
फोन पर रोई जब दादी,
उठी जब ताया कि अर्थी,
हुए जब फूफा जी भर्ती,
वहां सुख दुःख के अजूबे थे,
यहाँ हम काम में डूबे थे,
सुनहरे हैं अपने पलछिन,
जेब में पैसे हैं लेकिन,
होंगे शामिल कंगालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
फोन पर रोई जब दादी,
उठी जब ताया कि अर्थी,
हुए जब फूफा जी भर्ती,
वहां सुख दुःख के अजूबे थे,
यहाँ हम काम में डूबे थे,
सुनहरे हैं अपने पलछिन,
जेब में पैसे हैं लेकिन,
होंगे शामिल कंगालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
वहां पर लाईट जाती है,
पड़ोसिन शोर मचाती है,
रिसर्वेशन का फंदा है,
वहां का ट्रैफिक गन्दा है,
हर तरफ भीड़ भड़क्का है,
हर तरफ धूल धड़क्का है,
लोग भी कितने रूखे हैं,
सभी दौलत के भूखे हैं,
फटते हैं बम चौबारों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
पड़ोसिन शोर मचाती है,
रिसर्वेशन का फंदा है,
वहां का ट्रैफिक गन्दा है,
हर तरफ भीड़ भड़क्का है,
हर तरफ धूल धड़क्का है,
लोग भी कितने रूखे हैं,
सभी दौलत के भूखे हैं,
फटते हैं बम चौबारों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
यहाँ पर कितनी सुविधा है,
भला क्यों मन में दुविधा है,
फूल सब सुन्दर खिलते हैं,
लोग मुस्काते मिलते हैं,
मुन्ना तलवार चलाता है,
मुन्नी को पियानो आता है,
यहाँ दिन रात सुहाने हैं,
और भी लाख बहाने हैं,
मन में पलते घोटालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
भला क्यों मन में दुविधा है,
फूल सब सुन्दर खिलते हैं,
लोग मुस्काते मिलते हैं,
मुन्ना तलवार चलाता है,
मुन्नी को पियानो आता है,
यहाँ दिन रात सुहाने हैं,
और भी लाख बहाने हैं,
मन में पलते घोटालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
वहां बच्चों पर काबू है,
वहां के स्वाद में जादू है,
सड़क पर चाट के ठेले हैं,
उन्हीं गलियों में खेले हैं,
कोई बर्तन धो जाता है,
झाड़ू कटका हो जाता है,
कपड़े प्रेस होकर आते हैं,
वहां त्यौहार मनाते हैं,
फिर भी डूबे हैं ख्यालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
आज हैं अपने घर से दूर,
भले कितने भी हों मशहूर,
हो दौलत भले ज़माने की,
हैं खुशियाँ सिर्फ दिखाने की,
याद जब मां की आती है,
रात कुछ कह कर जाती है,
ह्रदय में खालीपन सा है,
लौट चलने का मन सा है,
मगर हैं घिरे सवालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
हो दौलत भले ज़माने की,
हैं खुशियाँ सिर्फ दिखाने की,
याद जब मां की आती है,
रात कुछ कह कर जाती है,
ह्रदय में खालीपन सा है,
लौट चलने का मन सा है,
मगर हैं घिरे सवालों में,
रह पायेंगे आखिर कैसे,
हम घरवालों में,
कि बिछुड़े पंछी हैं.
हमारे दिल का सपना है,
देश जैसा है अपना है,
वहां परियों की कहानी है,
वहां गंगा का पानी है,
वहां माटी में खुशबू है,
वहां हर चीज़ में जादू है,
वहां रोटी है फूली सी,
वहां गलियां हैं भूली सी,
न उलझें व्यर्थ सवालों में,
रहना सीख ही जायेंगे,
अपने घरवालों में.....
रहना सीख ही जायेंगे,
अपने घरवालों में.....
- अभिनव
www.kaviabhinav.com
देश जैसा है अपना है,
वहां परियों की कहानी है,
वहां गंगा का पानी है,
वहां माटी में खुशबू है,
वहां हर चीज़ में जादू है,
वहां रोटी है फूली सी,
वहां गलियां हैं भूली सी,
न उलझें व्यर्थ सवालों में,
रहना सीख ही जायेंगे,
अपने घरवालों में.....
रहना सीख ही जायेंगे,
अपने घरवालों में.....
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प्रेषक: अभिनव @ 8/11/2010 6 प्रतिक्रियाएं
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