एक व्यंग्य - "ग्लोबल वार्मिंग - ए डिफरेंट पर्सपेक्टिव"

Feb 21, 2007

इधर 'हिंदी चेतना" के संपादक श्री श्याम त्रिपाठी जी से हमारी फोन पर बात हुई। उन्होंने पत्रिका के लिए एक व्यंग्य लिखने का अनुरोध किया तथा हमनें हाल फिलहाल की ज्वलंत समस्याओं में से एक का निवारण कर दिया। यह लेख अभी प्रकाशित नहीं हुआ है, यदि संपादक महोदय को अच्छा लगता है तो छपेगा, पर हमने सोचा कि अपने ब्लागर बन्धुओं को भी पढ़वाया जाए तथा उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त की जाए। भाई हम ठहरे कवि आदमी ये लेख वेख लिखना ज़रा धीरे धीरे आता है।
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"ग्लोबल वार्मिंग - ए डिफरेंट पर्सपेक्टिव"

आज कल जिधर देखो लोग ग्लोबल वार्मिंग हाय हाय की रट लगाए रहते हैं। किसी भी बात की तह तक जाए बिना हंगामा करना हमारे मानव समाज की बड़ी पुरानी आदत है। चाहे ईराक युद्ध हो, चाहे यू एन ओ का गठन, चाहे पोलियो अभियान हो और चाहे पंचशील के सिद्धान्त हम जानते हैं कि ये सब बिना तह तक गए हंगामा करने के कारण ही अपनी छीछा लेदर करा अमृत्व को प्राप्त हो चुके हैं।

चाहे ईराक युद्ध हो, चाहे यू एन ओ का गठन, चाहे पोलियो अभियान हो और चाहे पंचशील के सिद्धान्त हम जानते हैं कि ये सब बिना तह तक गए हंगामा करने के कारण ही अपनी छीछा लेदर करा अमृत्व को प्राप्त हो चुके हैं।

परंतु जिस प्रकार पक्षियों में हंस है, पशुओं में सिंह है, कारों में रौल्स रायस है, नमक में टाटा है, कंप्यूटर में इंफोसिस है, इलेक्ट्रनिक्स में सोनी है, मैटल्स में प्लैटिनम है, अधोवस्त्रों में वी आई पी है, दवाओं में पुदीन हरा है तथा शीशियों में डिटौल है, ठीक उसी प्रकार मानव समाज में भी कुछ उत्कृष्ट जन हैं। ये उत्कृष्ट जन समाज की धारा की परवाह किए बिना अपनी बात रखना अपना फर्ज़ समझते हैं। मैं भी उन्हीं में से एक हूँ अतः अपनी बात आपके सामने रख रहा हूँ।

ना जाने हमारे बुद्धिजीवी 'ग्लोबल वार्मिंग' को लेकर अपने आपको इतना चिंतित दिखाने की फिराक में क्यों हैं। यह तो हम सभी जानते हैं और अपने तुलसीदास बाबा भी कह गए हैं कि,

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।

अब जब होना वही है जो पहले से तय है तो उनके आपके या हमारे टेंशन लेने से क्या कुछ बदल जाएगा? दूसरी बात ये कि टेंशन तो तब लिया जाए जब टेंशन वाली कोई बात हो, 'गलोबल वार्मिंग' तो हमारे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होने वाली है। सबसे पहली खुशी की बात तो यह होगी कि हमें दिन में दफ्तर नहीं जाना पड़ेगा क्योंकि दफ्तर रात को खुला करेंगे। बच्चे भी रोज़ सुबह सुबह स्कूल जाने की चिकचिक से बच जाएँगे। इससे भारत वाले अमेरिका के टाईम ज़ोन का आनंद घर बैठे उठा सकेंगे तथा अमेरिका वाले भारत की समय सारणी के अनुसार अपने कार्य करने पर बाध्य हो जाएँगे।

इससे नए नए उद्योगों को पनपने में भी सहायता मिलेगी, जैसे मोबाइल कूलिंग चैंबर उद्योग, गर्मी बचाओ सूट उद्योग आदि इत्यादि। इससे कुछ उद्योगों का विकास भी बड़ी तेज़ी से होगा, जैसे नीबू बंटा उद्योग, फ्रिज उद्योग, कूलर एण्ड एसी उद्योग, जल उद्योग आदि। गली गली में स्वीमिंग पूल खुल जाएँगे जिसमें हम सुबह से शाम तक भैंसों की तरह नहा सकेंगे, इस प्रकार यह मानव और पशु के मध्य की जो कृत्रिम दूरी है वह भी दूर हो जाएगी। ऐसा सुनते हैं कि समुद्र भी अपनी बाउँड्री बढ़ा लेगा तथा अनेक शहर पानी में डूब जाएँगे जिससे नौका उद्योग के भी बढ़ने के बड़े आसार हैं।
लोग आजकर अपने सूर्यदेव की महत्ता को कम आंकने लगे हैं। भारत में तो इधर बाबा रामदेव के सूर्य नमस्कार पर भी प्रतिबंध लगाने की बात चल रही हैं। एक बार ग्लोबल वार्मिंग हो जाए तो सारा संसार मिल कर सूर्य देव को नमस्कार करने पर विचार करने लगेगा।
एक बार ग्लोबल वार्मिंग हो जाए तो सारा संसार मिल कर सूर्य देव को नमस्कार करने पर विचार करने लगेगा।
हार्वड और कैम्ब्रिज में सूर्य नमस्कार पर डिग्री दी जाने लगेगी तथा इससे भारतीय संस्कृति का वैश्विक स्वरूप भी उभर कर सामने आ जाएगा।
आम आदमी के जीवन में तो 'ग्लोबल वार्मिंग' एक क्रान्ति की तरह आएगी तथा उसके जीवन को बदल कर चली जाएगी।

'ग्लोबल वार्मिंग' के विरोधी आपको डराने के लिए भाँति भाँति के प्रपंच तथा टोटके करेंगे। ये कहानी तो वे सामान्यतः खूब सुनाते हैं कि,
"एक बार दो मेंढकों पर एक प्रयोग किया गया। एक मेंढक को सीधे सीधे गर्म पानी के भगोने में छोड़ा गया तो वह फटाक से उस भगोने से कूद कर बाहर आ गया। दूसरे मेंढक को सामान्य तापमान के जल से भरे भगोने में रखा गया तथा उस भगोने को गैस पर चढ़ा दिया गया। यह मेंढक वहीं जल में पड़ा पड़ा अपने अगले शरीर की ओर प्रयाण कर गया। आज हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है, धरती का तापमान धीरे धीरे उसी भगोने की तरह बढ़ रहा है और हम उसी मेंढक की तरह धीरे धीरे एक अवश्यंभावी विनाश की ओर अग्रसर हो रहे हैं।"

मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसी हर गाथा का विरोध करता हूँ जिसमें आपको या मुझको मेंढक कहा जाए। यह तो हमारा सामूहिक अपमान है। तथा दूसरी बात ये कि यदि हमारे नीचे कोई गैस जलाएगा तो भगोने के तले पर लगे हमारे पैरों को तो पहले ही पता चल जाएगा। अतः आप इनकी बातों से भ्रमित मत होइएगा। मौसम बदल रहा है, ठीक बात है पर इसमें नया क्या है, परिवर्तन तो युग का नियम है। धरती का तापमान बढ़ रहा है, यह अच्छी बात है तथा हमको इसको सकारात्मक रूप में लेना चाहिए।

यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमारी पत्नी हमसे चाय बनाने को कहेगी और हम बस दूध, पत्ती डाल कर पतीला बाहर रख देंगे तथा दस मिनट में लाजवाब चाय तैयार हो जाएगी। इससे गैस अथवा बिजली का बिल में भी कटौती होगी तथा उस पैसे से हम नए फैशन वाला गर्मी बचाओ सूट भी खरीद सकेंगे। इस लेख को पढ़ने वाले सभी आदरणीय देवियों और सज्जनों से मेरा अनुरोध है कि वे तुरंत अपना फोन उठा के १-८००-ग्लोबल-वार्मिंग डायल करें तथा एल गोर साहब से कह दें कि अब हम किसी 'इनकन्विनियंट टरुथ' के जाल में फंसने वाले नहीं हैं। हम जान गए हैं कि संसार का भविष्य 'गलोबल वार्मिंग' में ही है।

सूर्य नमस्कार सहित,

आपका
अभिनव
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नोटः लेख में जो स्पेशल एफेक्ट बीच में नीली लाईन के ऊपर लिखी कुछ पंक्तियों से आ रहा है, उसके लिए लेखक याहू चैट बनाने वाले के प्रति तथा श्रीमान फुरसतिया महाराज उर्फ अनूप शुक्ला जी के प्रति अपना आभार व्यक्त करता है।

4 प्रतिक्रियाएं:

वाह वाह भाई साहब मजा आ गया...क्या खूब कही है आपने..."ग्लोबल वार्मिंग" की तरह ही "एड्स" के हौवे पर भी कोई व्यंग्य लिखिये..
इस नाचीज के चिट्ठे पर भी एक नजर डाल दीजिये..
http://www.sureshchiplunkar.blogspot.com

Reetesh Gupta said...

वाह भाई अभिनव ...बहुत सुंदर व्यंग्य है...पढ़कर मजा आ गया....बधाई

ग्लोबल वार्मिंग पर शुद्ध भारतीय प्रतिक्रिया बहुत भाई. हम तो 'हुइयै सोइ जो राम रचि राखा' में विश्वास रखते हैं . चिंता कैसी .

बिल्कुल सही कहिन भैय्य्य्या! ई वैश्विक गर्मी सारी समस्याओं का समाधान कर देही। हिमालय पिघल सागर उमड़ मुम्बइया दिल्लीवा सहित सारी 1/4 धरती, 3/4 पानी में घुस शीतल हो जाहीं, न रहिन समाज, न रहिन समस्या...