राष्ट्रभाषा हिन्दी

Feb 13, 2007

मित्रों, इधर 'हिंदी चेतना' का नया अंक पढ़ने को मिला। 'हिंदी चेतना', हिन्दी प्रचारणी सभा, कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका है। इसके संपादक श्याम त्रिपाठी जी हैं तथा इसमें प्रवासी लेखकों तथा कवियों के साथ भारत के लेखकों तथा कवियों की सामग्री भी पढ़ने को मिलती है।
इसमें लखनऊ के आलोक सिंह चौहान जी की राष्ट्रभाषा हिंदी नामक कविता नें ध्यान आकृष्ट किया है। आलोक जी की तस्वीर के अनुसार वे अभी काफी युवा तथा संभावनाशील लग रहे हैं। हिंदी भाषा पर इस भाव की अनेक रचनाएँ लिखी गई हैं परंतु आलोक जी की जो कविता में नीचे टाईप कर रहा हूँ उसका प्रवाह मुझे अच्छा लगा। यदि आप इसे बोल कर पढ़ने की कोशिश करें तो कविता बहती चली जाती है।

राष्ट्रभाषा हिन्दी

मैं राष्ट्रगान के मस्तक पर,
सदियों से अंकित बिंदी हूँ,
मैं सबकी जानी पहचानी,
भारत माता की हिंदी हूँ,

मेरी बोली को मीरा नें,
मनमोहक काव्य सुनाया है,
और सूरदास के गीतों में,
मैंनें कम मान ना पाया है,

वह तुलसी की रामायण भी,
मेरे मुख से चरितार्थ हुई,
सन्तों विद्वानों की वाणी,
गुंजरित हुई साकार हुई,

भूषण रसखान जायसी भी,
मेरे ही स्वर में गाते हैं,
औ पंत निराला प्रेमचन्द,
मेरी महिमा दोहराते हैं,

भारत में जितनी भाषाएँ,
सब मेरी पूज्य सहेली हैं,
हम सबमें अनुपम प्यार भरा,
हम बहनें हैं हमजोली हैं,

हर एक देश में निज भाषा,
माँ जैसा गौरव पाती है,
हिन्दी अपने ही बेटों में,
दूजी माँ समझी जाती है,

जो बेटों में आदर पाए,
वो माता किस्मत वाली है,
जो मुखर राष्ट्र के जनगण में,
वो भाषा गौरवशाली है।

कवि: आलोक सिंह चौहान


- 'हिंदी चेतना' - हिन्दी प्रचारणी सभा, कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका, वर्ष ९, अंक ३३, जनवरी २००७ से साभार

5 प्रतिक्रियाएं:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया. साधुवाद इस कविता को यहाँ तक लाने के लिये.

संजय बेंगाणी said...

बहुत ही सुन्दर कविता.

SHAMBHU said...

आपने इतनी अच्छी कविता लिखी है कि मन भर आया,हम नालायक बेटों ने अपनी मां की ही दुर्दशा करके रख दी है। आज हम पश्चिमी जगत का लगातार गुणगान करते हैं,अपने पूर्वजों को नकारते हैं,इसके लिए हम स्वयं ही दोषी हैं।

शंभु नाथ

HEERA said...

आप के इस सुन्दर कविता में गागर में सागर जैसा भाव अनुभव होता है ,
इतने अछे संकलन के परिणामस्वरुप मुझे हिंदी कार्यशाला के दौरान पुरस्कृत किया गया है.

HEERA said...

आप के इस सुन्दर कविता में गागर में सागर जैसा भाव अनुभव होता है ,
इतने अछे संकलन के परिणामस्वरुप मुझे हिंदी कार्यशाला के दौरान पुरस्कृत किया गया है.