कितनी जानलेवा है दोपहर की खामोशी,
ये नगर की खामोशी वो शहर की खामोशी,
सब तो बोल देती है इस नज़र की खामोशी,
जाने किस सफ़र पर है मेरे घर की खामोशी,
लखनऊ से गुज़रे हैं लोग तो बहुत से मगर,
साथ सिर्फ़ कुछ के है उस डगर की खामोशी.
Abhinav Shukla
206-694-3353
अलार्म बज बज कर, सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है, बाहर बर्फ बरस रही है, दो मार्ग हैं, या तो मुँह ढक कर सो जाएँ, या फिर उठें, गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ।
प्रेषक: अभिनव @ 5/23/2009 7 प्रतिक्रियाएं
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प्रेषक: अभिनव @ 5/17/2009 8 प्रतिक्रियाएं
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मौन की भाषा को समझना,
फिर भी सरल है,
कठिन तो होता है,
शब्दों के वास्तविक अर्थ को जानना,
भाषा में छिपे मौन को पहचानना.
- अभिनव
प्रेषक: अभिनव @ 5/03/2009 2 प्रतिक्रियाएं
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आप निम्न लिंक पर जाकर पृष्ठ १५ पर पढ़ सकते हैं, 'एक हिंदी कवि का अंग्रेजी इंटरव्यू'.
http://www.thesouthasiantimes.info/epaper/47_vol1_epaper.pdf - Page 15
प्रेषक: अभिनव @ 3/17/2009 1 प्रतिक्रियाएं
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प्रेषक: अभिनव @ 1/27/2009 1 प्रतिक्रियाएं
प्रेषक: अभिनव @ 1/10/2009 5 प्रतिक्रियाएं
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तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में,
जब अयोग्य जुगनू सूरज के सिंहासन पर दिखता है,
जब खोटा पत्थर का टुकड़ा कनक कणी सा बिकता है,
जब शब्दों का मोल आँकने वाला मापक बहरा है,
जब असत्य परपंच अनर्गल संभाषण ही टिकता है,
मिलता है सम्मान उसी संभाषण को श्लोकों सा,
तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में,
मैंने पहचाना फूलों को गंधों के व्याकरणों से,
और बाग को पहचाना है माली के आचरणों से,
बगिया की शोभा है रंग बिरंगो फूलों की क्यारी,
एक रंग के फूलों को जब अलग निकाला जाता है,
सिर्फ उन्हें जब राजकुमारों जैसे पाला जाता है,
तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में,
मेरे नियम ग़लत थे जो मैं मानवता का हामी था,
सत्य बोलने को प्रस्तुत था भोलापन अनुगामी था,
अपने साथी के सिर पर मैं पाँव नहीं धर सकता था,
लाभ हानि की खातिर झूठी बात नहीं कर सकता था,
आज खेल में जब शकुनि के पासे रंग दिखाते हैं,
तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में,
जब पुस्तक की शोभा भर होती हों समता की बातें,
झूम नशे में जब मेहनत का मोल लगाती हों रातें,
आदर्शों के मूल धंसे हों येन केन और प्रकारेन में,
तब लगता है ठगा गया हूँ मैं जीवन के लेन देन में.
प्रेषक: अभिनव @ 1/03/2009 5 प्रतिक्रियाएं
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