डॉ. उर्मिलेश: शब्दों में जीवित, स्मृतियों में आलोकित

Jul 7, 2026


कुछ व्यक्तित्व जीवन में केवल मिलते नहीं, वे भीतर कहीं स्थायी रूप से बस जाते हैं। डॉ. उर्मिलेश शंखधार जी मेरे लिए ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। साहित्य के विराट आकाश में वे ओज, गीत, ग़ज़ल और वाचिक परंपरा के तेजस्वी नक्षत्र थे, पर मेरे मन में उनकी स्मृति केवल एक बड़े कवि के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मीय प्रेरक, स्नेहिल मार्गदर्शक और गरिमामयी उपस्थिति के रूप में अंकित है।

मुझे आज भी वह समय याद है जब मैं बरेली के रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय का छात्र था और कविता की दुनिया मुझे अपनी ओर खींच रही थी। विश्वविद्यालय के कवि सम्मेलन में डॉ. उर्मिलेश जी से पहली भेंट हुई। मेरे काव्य पाठ के बाद उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और बदायूँ आने को कहा। वह बुलावा केवल एक वरिष्ठ कवि का निमंत्रण नहीं था, वह मेरे भीतर के कवि को पहचान लेने वाली दृष्टि थी।
एक रविवार मैं बरेली से बस पकड़कर बदायूँ पहुँचा और उनके घर गया। वहाँ चाय-नाश्ते के आत्मीय क्रम के बीच मैंने अपनी कविताएँ सुनाईं। उन्होंने स्नेहपूर्वक अपनी पुस्तकें भेंट कीं और फिर अपने पूज्य गुरुदेव डॉ. बृजेन्द्र अवस्थी जी तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त किया। उस दिन मुझे लगा कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, संस्कारों की परंपरा भी है। यदि डॉ. उर्मिलेश जी का वह स्नेहिल आग्रह न मिला होता, तो शायद मेरे भीतर लिखने का वह विश्वास इतनी गहराई से न जागता।
बाद में उनकी सुपुत्री और सुप्रसिद्ध कवयित्री डॉ. सोनरूपा विशाल जी के विवाह में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला। आज भी वह विवाह मेरे जीवन में देखे गए सबसे सुंदर, आत्मीय और अविस्मरणीय वैवाहिक आयोजनों में से एक है। कुछ वर्ष पूर्व श्रेष्ठ कवि कुलदीप अंगार जी द्वारा आयोजित काव्य-संध्या में जब डॉ. सोनरूपा विशाल जी और उर्मिलेश जी के सुपुत्र अक्षत जी से भेंट हुई, तो वह क्षण भी मेरे लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला था। उनके घर “सृजन” में फिर से जाना मानो स्मृतियों के उसी आँगन में लौट जाना था, जहाँ कभी उनकी उपस्थिति, उनका स्नेह और उनका आशीर्वाद अनुभव किया था। डॉ. उर्मिलेश जी के परिजनों के प्रति भी मन में गहरी कृतज्ञता है, जिन्होंने उनकी स्मृतियों और साहित्यिक विरासत को इतने स्नेह और सम्मान के साथ संजोकर रखा है।
डॉ. उर्मिलेश जी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वे मंच के शिखर पर खड़े होकर भी नए रचनाकारों को हाथ पकड़कर ऊपर लाने का साहस रखते थे। उनकी वाणी में राष्ट्र का स्वाभिमान था, पर हृदय में सहज मानवीयता। वे ओज के कवि थे, पर संवेदना से रिक्त नहीं। वे गीतकार थे, ग़ज़लकार थे, मंच पुरुष थे, पर सबसे बढ़कर वे ऐसे मनुष्य थे जिनसे मिलकर व्यक्ति अपने भीतर कुछ अच्छा बचा हुआ महसूस करता था।
एक बार वे मेरे स्वप्न में आए। वह स्वप्न नहीं, जैसे सचमुच उनका आना था। मैं जागा तो भीतर एक अजीब शांति थी, जैसे उन्होंने फिर वही कहा हो कि चलते रहो, लिखते रहो, थको मत। उनकी कही पंक्ति आज भी मन को सहारा देती है, “इतना आदी हुआ हूँ चलने का, बैठते ही थकान होती है।” यह केवल शेर नहीं, उनका जीवन-दर्शन था।
आज उनकी 75वीं जन्मजयंती पर जब उन्हें स्मरण करता हूँ, तो लगता है कि वे कहीं गए नहीं हैं। वे अपने शब्दों में हैं, अपने संस्कारों में हैं, अपने शिष्यों और प्रियजनों की स्मृतियों में हैं। वे हर उस व्यक्ति में जीवित हैं जिसे उन्होंने लिखने, सोचने और मनुष्य बने रहने की प्रेरणा दी।
डॉ. उर्मिलेश को नमन। एक कवि को ही नहीं, एक आलोक पुरुष को नमन।

गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १

Jun 29, 2026



गोविन्दाष्टकम् – श्लोक १
सत्यं ज्ञानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाकाशम् ।
(सत्यम् + ज्ञानम् + अनन्तम् + नित्यम् + अनाकाशम् + परम + आकाशम्)
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलमनायासं परमायासम् ॥
(गोष्ठ + प्राङ्गण + रिङ्खण + लोलम् + अनायासम् + परम + आयासम्)
मायाकल्पितनानाकारमनाकारं भुवनाकारम् ।
(माया + कल्पित + नाना + आकारम् + अनाकारम् + भुवन + आकारम्)
क्ष्मायानाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥
(क्ष्मायाः + नाथम् + अनाथम् + प्रणमत + गोविन्दम् + परम + आनन्दम्)
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सत्यम् – Absolute Truth; Ultimate Reality
ज्ञानम् – Pure Consciousness
अनन्तम् – Infinite; Endless
नित्यम् – Eternal
अनाकाशम् – Beyond space; Not limited by space
परम – Supreme
आकाशम् – Space; Ether
परमाकाशम् – The Supreme, Infinite Consciousness
गोष्ठ – Cowherd settlement
प्राङ्गण – Courtyard
रिङ्खण – Crawling
लोलम् – Delighting in
गोष्ठप्राङ्गणरिङ्खणलोलम् – Delighting in crawling through the courtyards of Gokula
अनायासम् – Effortlessly
परमायासम् – Great effort
माया – Divine power
कल्पित – Projected
नाना – Many
आकारम् – Forms
मायाकल्पितनानाकारम् – Appearing in countless forms through Māyā
अनाकारम् – Formless
भुवनाकारम् – Whose form is the entire universe
क्ष्मायाः – Of the Earth
नाथम् – Lord; Protector
क्ष्मायानाथम् – Lord of the Earth
अनाथम् – Independent; Protector of the helpless
प्रणमत – Bow down
गोविन्दम् – Govinda
परमानन्दम् – Supreme Bliss