अलार्म बज बज कर,
सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है,
बाहर बर्फ बरस रही है,
दो मार्ग हैं,
या तो मुँह ढक कर सो जाएँ,
या फिर उठें,
गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ।
टूटी फूटी रचनायें करते हुए ही मंच मिल गए तो अपने आप को कवि समझने लगे. जब वास्तविकता खुली तो लगा कि कितने भुलावे में थे. कभी कभी लगता है, काश भुलावों में ही पूरा जीवन कट जाता तो कितना अच्छा रहता. इन्हीं भुलावों की रस्साकशी जब हकीक़त के साथ होती है तो कभी कभी कुछ लिख जाता है. उसे ही आपके साथ बांटने का एक ज़रिया है ये ब्लॉग.
4 प्रतिक्रियाएं:
आनन्द आया सुन कर.
Its wow only not well....
बहुत शानदार प्र्स्तुति है। वन्देमातरम । धन्यवाद।
वाह !
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