इधर हमको भगवान् श्री कृष्ण की नगरी वृन्दावन जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, बांके बिहारी जी के मन्दिर के बाहर कुछ भजन पुस्तिकाएं प्राप्त हुयीं. उनमें मेरे प्रिय गीत 'सावन का महीना' की तर्ज पर एक भजन भी मिला. वैसे तो फिल्मी गीतों की तर्ज़ पर भजनों में भक्ति भाव का आभाव और प्रदर्शन का आधिक्य होता है, पर ये अच्छा लगा.


मूल गीत आप यहाँ पढ़ सकते हैं.


ये रहा वो भजन,

फागुन का महीना केसरिया रंग घोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर,

ओढ़ के आई कान्हा नई रे चुन्दरिया,
भर पिचकारी मोहे मारो न सांवरिया,
भर पिचकारी मारी कर दीन्हीं सरवोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर,

उड़त गुलाल श्याम लाल भये बदरा,
राधा की आंखन को बिगडो है कजरा,
ननद देय मोय तानो घर सास करे शोर,
होरी खेलें राधा संग नटवर नन्द किशोर.


इसको मूल गीत की तर्ज पर गा कर देखिये..

पुस्तक में इसके रचयिता का नाम नही है, ये लिखा है की "आभार उन सभी भक्तों का जिनके लिखे गीत इसमें शामिल किए गए हैं." अतः हमारी और से भी आभार.

चित्र सौजन्य: ISKCON


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2 comments:

    Udan Tashtari said...

    लो भाई, हमारा भी आभार टिकवा दो. कहाँ हो?? भारत में कि लौट गये?

  1. ... on 12:30 PM  
  2. रवीन्द्र प्रभात said...

    सुंदर ब्लॉग , वेहतर अभिव्यक्ति .....और सात्विक सोच ....बधाईयाँ !

  3. ... on 7:50 PM