तुलसी के पदचिन्हों पर धर पाँव गए हैं - श्रद्धान्जलि

Jan 23, 2007



(डा बृजेन्द्र अवस्थी बैंगलोर के टाऊनहाल में काव्य पाठ करते हुए)

डा अवस्थी पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे, पहले कुछ दिनों तक बदायूँ में इलाज होने के बाद उन्हें लखनऊ के पीजीआई में भरती किया गया। लगभग तीन सप्ताह पहले जब उनसे मेरी बात हुई तो पता चला कि उनका स्वास्थ्य कुछ खराब चल रहा है। मैंनें पूछा तो वे बोले अरे बेटा, ये तो बुढ़ापे की बिमारियाँ हैं हमारे साथ ही जाएँगी। किसे पता था कि ये बीमारियाँ उन्हें हमारे बीच से ऐसे लेकर चली जाएँगी। उन्होंने यह भी बतलाया कि शंकराचार्य पर लिखा हुआ उनका महाकाव्य पूरा हो रहा है। पिछले तीन चार वर्षों में उनहोंने शिवाजी, बजरंग बली, परशुराम तथा अब शंकराचार्य पर अद्भुत महाकाव्यों की रचना की है। डा अवस्थी नें जिस जिस पात्र पर लिखा उस उस के साथ संपूर्ण न्याय किया है। उनके काव्यों में भाषा शिल्प और शब्द संयोजन का चमत्कार तो है ही पर संग में है एक ऐसी गैहरी पैठ कि इन ग्रन्थों का उपयोग शोध हेतु किया जा सकता है।

कारगिल युद्ध के समय लिखी गई उनकी पुस्तक 'जवानों ज़िन्दाबाद' का विमोचन लखनऊ महोत्सव १९९९ में हुआ, अपने सौभाग्य से मैं भी उस दिन मंच पर उनकी सेवा में उपस्थित था। उस दिन अवस्थी जी नें अपनी इसी पुस्तक के छन्द श्रोताओं को सुनाए। अपने विशिष्ट अंदाज़ एवं बुलंद आवाज़ में सुनाई गई पंक्तियाँ आज भी मेरे मन में ऐसे गूँज रहीं हैं जैसे मानो कल की ही बात हो।
कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन मनोज पाण्डेय पर लिखा हुआ उनका यह छन्द सुनकर सभागार बडी़ देर तक तालियों से गूंजता रहा,

माता ब्रजमोहनी का लाल लखनऊ ही क्या,
लाल सारे भारत का ही अनन्य हो गया,
हिमवात चीर टाईगर जय हेतु बढ़ा,
अभियान अमित प्रभावजन्य हो गया,
कैप्टन मनोज पाण्डेय राष्ट्र को दे बलिदान,
वीर बलिदानियों में अग्रगण्य हो गया,
परमवीर चक्र से वो आहुति न धन्य हुई,
आहुति से परमवीर चक्र धन्य हो गया।


युद्ध के समय एक माँ के संशय को दर्शाता यह छन्द सुनकर किसका हृदय ना गर्व से तन जाए,

युद्ध भूमि छिन्न भिन्न शवों से भयानक है,
रात का सघन अंधकार गहराया है,
हाथ में मशाल लिए तू क्या यहाँ खोज रही,
मैया तूने भी क्या किसी रत्न को गंवाया है,
बोली मेरा इकलौता लाल बलिदान हुआ,
गर्व भरा मैंने समाचार अभी पाया है,
खोजती उसी की लाश यह देखने के लिए,
पीठ पर उसने तो घाव नहीं खाया है।



युद्ध के समय स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का पुनीत संकल्प याद दिलाता यह छन्द सुनकर शरीर में एक सिहरन सी दौड़ जाती है,

छोटे छोटे बच्चों नें अटलजी को पत्र लिखा,
पूज्य श्री अटलजी हमारा ध्यान करेंगे,
नाश्ते के पैसे हम जोड़ जोड़ भेज रहे,
उनको शहीदों के लिए प्रदान करेंगे,
हमलावरों को शीघ्र धरा की चटा के धूल,
ऊँचा इस धरती का स्वाभिमान करेंगे,
जब तक देश की सीमाओं पर युद्ध होगा,
तब तक हम नहीं जलपान करेंगे।


डा अवस्थी की वाणी के ओज से पूरे सभागार में रात के तीन बजे एक अद्भुत जोश एवं चेतना का संचार हो गया था।

वैसे तो डा अवस्थी हर रस में कविता करते थे पर मंचों पर उन्हें मुख्यतः राष्ट्रीयता के स्वर से ओत प्रोत कविताओं के लिए जाना जाता था। वे अद्भुत आशुकवि थे, बात की बात में छन्द रच देने की उनकी क्षमता अतुलनीय थी।

सियारामशरण तक लगा प्राण का दाँव गए हैं,
तुलसी के पदचिन्हों पर धर पाँव गए हैं,
पूज्य मैथलीशरण मैथली शरण प्राप्त कर,
छोड़ एक चिरगाँव, एक चिरगाँव गए हैं।


मैथलीशरण गुप्त के देहवसान के समय डा बृजेन्द्र अवस्थी नें यह पंक्तियाँ लिखी थीं। आज वे स्वयं तुलसी के पदचिन्हों पर पाँव धर के जा चुके हैं। डा अवस्थी के जाने से हिंदी कविता के एक युग का अंत हुआ है किंतु उन्होंने जो कविताएँ लिखी हैं वे आने वाले युगों युगों तक मानव समाज को उत्कृष्ट साहित्य से परिचित कराती रहेंगी। अपने स्वाभिमान एवं संस्कारों को सबसे अधिक महत्ता देने वाले डा अवस्थी का विराट व्यक्तित्व अपने आप में निराला है। नए एवं उदीयमान कवियों को प्राश्रय तथा उनके काव्य को सही दिशा देने का कठिन संकल्प डा अवस्थी नें आजीवन निभाया। आज उनके अनेक शिष्य हिन्दी काव्य जगत में अपनी सुगंध बिखेर रहे हैं। उनके जाने से हिन्दी जगत को तो अपूर्व क्षति हुई ही है, वहीं अनेक कवियों नें अपने आदर्श पितामाह एवं गुरू को खो दिया है। व्यक्तिगत रूप से मुझे ऐसा लग रहा है मानो मेरे हृदय में एक शून्य सा उत्पन्न हो गया हो, एक ऐसा शून्य जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकेगी।

अपने कद से ना घटें कभी,
सच्चाई से ना हटें कभी,
आंधी में अविचल टिक जाएँ,
हम तुम कुछ अच्छा लिख जाएँ,
वह ही सच्चा अर्पण होगा,
वह सच्ची श्रद्धान्जलि होगी।


इस शनिवार को सिएटल में डा बृजेन्द्र अवस्थी की स्मृति में एक कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। हमारा प्रयास है कि इसे हम मेसेन्जर द्वारा अंतरजाल पर प्रसारित करें। यदि आप इस कार्यक्रम में डा अवस्थी को श्रद्धान्जलि देते हुए कुछ कहना चाहते हैं अथवा उनसे जुड़ा अपना कोई संस्मरण सुनाना चाहते हों तो कृपया मुझे निम्न पते पर एक ई-मेल भेजें।
shukla_abhinav at yahoo.com
कार्यक्रम का समय है:
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ४ से ५ (पी एस टी - सिएटल)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ५ से ६ (एम एस टी - फीनिक्स)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ६ से ७ (सी एस टी - शिकागो)
२७-जनवरी-२००७ शनीवार - सायं ७ से ८ (ई एस टी - न्यूयार्क)
२८-जनवरी-२००७ रविवार - मध्यरात्रि १२ से १ (जी एम टी - इंगलैंड)
२८-जनवरी-२००७ रविवार - प्रातः ५-३० से ६-३० (आई एस टी - भारत)


(डा बृजेन्द्र अवस्थी का बैंगलोर एयरपोर्ट पर स्वागत करते हुए अभिनव शुक्ल)

नोटः २००५ में डा अवस्थी बैंगलोर आए थे, उनके सम्मान में वहाँ एक बडी़ आत्मीय सी और छोटी सी काव्य गोष्ठी आयोजित की गई थी। उस गोष्ठी के कुछ अंश यहाँ हैं, वीडियो बहुत साफ नहीं है पर ध्वनि ठीक है। वीडियो के प्रारंभ में डा अवस्थी अपने संघर्षमय जीवन के विषय में बता रहे हैं तथा फिर उन्होंनें श्रंगार, वात्सल्य, भक्ति रस में डूबी अपनी कविताएं सुनाई हैं तथा अंत में ओज की रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।

7 प्रतिक्रियाएं:

antarman said...

श्रध्धेय श्री अवस्थी जी सदा हमारे साथ रहेँगेँ -- हमारा पथ -प्रदर्शन करते , अँधकार को चिरती हई मशाल की तरह रह कर --
श्री अवस्थी जी जैसे अमर कवि अपनी कविताओँ से अमर हैँ -
मैँ उन्हेँ सच्चे ह्र्दय से, सादर प्रणाम करती हूँ --

अभिनव भाई,
आप को इस लेख पर मेरे
स स्नेह आशिष

--लावण्या

जो क्षति महसूस कर रहे आज यहां हम सब
है संभव क्या अभाव पूरा कर पायेंगे
वह ओज भरे शब्दों की मॄदु अमॄत वाणी
बस सुबह शाम हम रह रह कर दोहरायेंगे
उनके पावन पदचिन्ह कभी छू लें हम भी
हर रोज यही इक मंगल स्वप्न सजायेंगे
चंदन की कलम शहद में डुबो डुबो कर भी
हम नाम अमिट वह लिखने में सकुचायेंगे

Prabu said...

I had great privilage listening Dr. Awasthi many times on Kavi Sammelan manch, in Lakhimpur Kheri (UP). He was genuine veer ras kavi, and great ashu kavi. As I heard somewhere on the net He got sick while sitting for hours in a kavi sammlen (that too in Lakhimpur Kheri)which finally proved his last Kavi Sammelan. He was so gentle. God bless his soul.

Neeraj Rohilla said...

अभिनवजी,

डा. अवस्थी के निधन से हिन्दी साहित्य की अपार क्षति हुई है.

ह्र्दय को छू लेने वाली श्रद्धान्जलि लिखने और उनकी रचनाओं को वीडीओ के माध्यम से प्रसारित करने पर साभार स्वीकार करें.

ईश्वर उनके परिवार को सान्तवना प्रदान करे.

Udan Tashtari said...

डा अवस्थी को श्रद्धान्जलि एवं हार्दिक नमन.

Surendra Nath Tiwari said...

Abhinav ji
The news is shocking to me! I know, all of us have to pass-away sometimes, but I believe I had taken for granted that I will someday see Awasthi ji in Badaaun...Like I had a youth-age dream to see Dinkar ji in his Patna-house. Its very saddening to me. I vividly remember the evening when I first saw him at the JFK airport (1994/95?) with Hullad and Dr. Madhavi Lata Shukla......tired of a gruelling journey from India...but very calm and motivating Madhavi lata ji to not loose heart in the new country! I remember, they all were thirsty, I offererd coca-cola....(I had catered for the evntuality that they will be tired and thirsty, so I had packed Coke...but not water....did not even think about it...I thought I will impress them with the American Paani....Coke!!) ....all took coke, except Awasthi ji, saying.....ghar jaa kar paani milega na?...tab koi baat nahin hai!!! And then a whole week at my place...a grand-pa to our children, a brother to my father.....wooried about his daughters and grandchildren.....I have many pictures of the week......it was a great time for me....

The loss is particularly sadening because in this new Hindi-age, when all old and new, so-called poets, want to be a laughter-master and commercial, Awasthi ji stood on the manch with honest, original Hindi-poetry and roared like a tiger!!
I will miss him...!!
regards...
surendra

Aloke said...

i love kavi sammelan since my child hood and i belong to the same place Lakhimpur kheri where Shri Awasthi ji born and brought up.I have touched his feet and see a sant in him.It is sad to here the end of an era.my deep regards to the noble soul.kavi sammelan ko jamana unko hi aata tha,kavi maal, Garland of kavi,jo wo goonth dete the apni ashu kavita se ananad aa jata tha.