मित्रों यह मंत्र यहाँ पढ़ भी सकते हैं।
संरचनावाद -1/2 : व्याख्यान
14 hours ago
अलार्म बज बज कर, सुबह को बुलाने का प्रयत्न कर रहा है, बाहर बर्फ बरस रही है, दो मार्ग हैं, या तो मुँह ढक कर सो जाएँ, या फिर उठें, गूँजें और 'निनाद' हो जाएँ।
मित्रों यह मंत्र यहाँ पढ़ भी सकते हैं।
प्रेषक: अभिनव @ 11/16/2006 3 प्रतिक्रियाएं
Labels: हास्य कविता
पहले तो बात सुन के ज़रा डोलते हैं हम,
फिर एक एक करके पर्त खोलते हैं हम,
कुछ मूल जानने की लगाते हैं हम जुगत,
कुछ उसमें छुपे सत्य को टटोलते हैं हम,
जब लगता है ये बात सुनाने के योग्य है,
भाषा की चाशनी में भाव घोलते हैं हम,
कसते हैं कसौटी पे हृदय के कलाम को,
तब जाके चार शब्द कहीं बोलते हैं हम।
प्रेषक: अभिनव @ 11/16/2006 6 प्रतिक्रियाएं
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