ऐसे में, आप क्या कहते

Jun 13, 2006

गांधीजी के अंतिम शब्दों पर हुए विवाद के चलते कुछ भाव मन में आए थे तथा प्रतिक्रिया स्वरूप इस तुकबंदी का सृजन हुआ। आशा है कि आपके विचार इस रचाना पर प्राप्त होंगे तथा कुछ अन्य प्रसंग भी इससे जुड़ेंगे।

बड़े बड़े सब लोग जो भारत आते हैं,
सबसे पहले राजघाट पर जाते हैं,

विश्व पुरुष के आशीषों से तरते हैं,
पुष्प चढ़ाते और नमन वे करते हैं,

शब्द अंत के जनमानस पर अंकित हैं,
राजघाट के शिला लेख पर टंकित हैं,

राम राम, हे राम राम, हे राम राम,
गांधीजी के अंतिम शब्दों को प्रणाम्,

पर सोचो यदि कुछ ऐसा हो जाता जो,
और कोई ही शब्द जो बाहर आता तो,

वही शिला का लेख बना बैठा होता,
अपने भाग्य की रेखा पर ऐंठा होता,

हमने सोचा चलो 'ओपिनियन पोल' करें,
नए विचारों की मदिरा का घोल करें,

"शब्द भला क्या श्रीमुख से बाहर होते,
गांधीजी जी की जगह आप नाहर होते?"

प्रश्न किया हमनें आलोकित जन जन से,
उत्तर सबने दिया बड़े अपनेपन से,

उत्तर विविध विविध भांति के प्राप्त हुए,
कहने को कुछ नहीं है भाव समाप्त हुए,

कोई बोला यदि उस जगह मैं होता,
सबसे पहले मम्मी मम्मी कर रोता,

सच्ची सच्ची बात बताएँ तो भइया,
अपने मुख से बाहर आता हाय दइया,

गांधीजी की सिचुएशन के जैसे में,
ऊप्पस निकलता मेरे मुख से ऐसे में,

अपने साथ यदि कुछ ऐसा हो जाता,
मुख से उड़ कर उड़िबाबा बाहर आता,

कोई बोला मैं कहता कि मार डाला,
किसी नें कहा मैं कहता अरे साला,

जितने मुख उतनी बातों का घोटाला,
दुनिया सचमुच में है इक गड़बड़झाला,

गांधी जी की मृत्यु के इतने वर्ष बाद,
उनके अंतिम शब्दों पर छिड़ता विवाद,

और बहुत से शब्द उन्होंने बोले थे,
राज़ सत्य और मानवता के खोले थे,

हरिजन और अहिंसा को पहचानो रे,
गांधीजी के आदर्शों को जानो रे,

पहले के शब्दों का समझो सार सार,
फिर जाना अंतिम शब्दों के आर पार,

मत केवल परपंचों का अभियान करो,
हैं विवाद कुछ सच्चे उनका ध्यान करो।

यदि आप गांधीजी की जगह होते तो क्या होते आपके आखिरी शब्द?

5 प्रतिक्रियाएं:

शायद "ओह! भगवान"

उस समय पता नहीं क्या कहते? अभी तो यही कह रहे हैं-आदमी एक गोली तीन,बहुत नाइंसाफी है।

भइया अभिनव जी, अनुगूंज क्रमांक १९ का समापन लेख कहाँ है?
अनुगूंज २० तो शुरू भी हो गई।

Agastya said...

महात्मा गांधी की एक उक्ति कहीं देखी थी: "I believe in the message of truth delivered by all the religious teachers of the world. And it is my constant prayer that I may never have a feeling of anger against my traducers, that even if I fall a victim to an assassin's bullet, I may deliver up my soul with the remembrance of God upon my lips. I shall be content to be written down as an impostor if my lips utter a word of anger or abuse against my assailant at the last moment."

ऐसे व्तक्ति के मुंह से 'हे राम' नहीं निकलता, तो और क्या निकलता!

जो लोग गांधीजी की विचारधारा के खिलाफ थे उनमें ही से कुछ ने गांधीजी को मारने की साज़िश की थी, और आज उनके जैसी मानसिकता वाले लोग महात्मा के अंतिम शब्दों को विवादित करके उनकी छवि को धूमिल करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं ।